पक्षकारिता के साये में कुंठित होती पत्रकारिता

यूँ तो अनेकों ऐसे अवसर आते रहे हैं जब पत्रकारिता पर हावी होती कुंठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती रही है। किन्तु इधर के कुछ सालों में या ऐसा कहें कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बाद पत्रकारिता पर पक्षकारिता का एक ऐसा आवरण चढ़ा है कि अब मूल पत्रकारिता कहीं गुम सी होती दिख रही है। आज किसी भी अखबार या टी॰वी॰ चैनल को लगातार कुछ दिनों तक देखें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि वो किसके पक्ष या विरोध में काम कर रहा है। आज खबरें प्रायोजित हो चली हैं। अब स्वाभाविक सी बात है कि जब खबरें प्रायोजित हो जाएँ तो फिर वो निष्पक्ष कैसे रह पाएँगी। 
हालिया प्रसंग गौड़ी लंकेश नामक पत्रिका की संपादक गौड़ी लंकेश पैट्रियाक की हत्या से उपजे विवाद को ज़रा गौर से देखें तो बहुत सारी बातें परत दर परत खुलती नज़र आएंगी। एक अंजान सी महिला, उसकी हत्या के बाद अचानक राष्ट्रिय चर्चा की केंद्र बन गई। देश में अचानक से दो गुट स्पष्ट रूप से मुखर हो गए। सोशल मीडिया में भी दिन रात चर्चा शुरू हो गई। मीडिया घरानों में ऐसे पत्रकार जो सरकार के विपक्षी के तौर पर जाने जाते हैं, उन्होने लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ पर हमला बताते हुये सरकार की आलोचना का बिगुल फूँकना शुरू कर दिया। तो कुछ ऐसे मीडिया घराने जो सरकार से सहमति रखने वाले के तौर पर जाने जाते हैं उन्होने सरकार के बचाव में तर्क गढ़ने शुरू कर दिये। 
अब ध्यान देने वाली बात ये है कि जिस गौड़ी लंकेश को ले कर इतनी बड़ी चर्चा शुरू हो गई उसके बारे में देश के आम लोग कितना और क्या जानते थे। शायद कुछ भी नहीं। और शायद नहीं बल्कि यकीनन कुछ भी नहीं। क्योंकि वो किसी ऐसे राष्ट्रिय पत्र अथवा पत्रिका में नहीं लिखती थी जिसको पूरे देश में पढ़ा जाता हो। न ही जिस भाषा में वो लिखती थी उसे पूरे देश में लिखा या पढ़ा जाता है। मतलब कि गौड़ी लंकेश को देश ने उसकी हत्या के बाद ही जाना या उसका परिचय देश से हुआ। उसकी हत्या के बाद जब देश के जिज्ञासु लोगों ने उनके बारे में जानने कि कोशिश की तो ये सामने आया कि गौड़ी लंकेश नामक वो महिला वामपंथी राजनीति से प्रभावित एक ऐसी महिला थी जिसे दक्षिणपंथी राजनीति और विचारधारा से ज़बरदस्त बैर और विरोध था। और अपने इसी विरोध को ज़ाहिर करने के लिए उसने स्वयं के नाम से एक पत्रिका का संचालन और सम्पादन करना शुरू कर दिया। और इसी पत्रिका के माध्यम से वो अपने विचारधारा की लड़ाई लड़ती रही। तो उसके बारे में ये जिज्ञासा भी लोगों में तब जागी जब इस घटना की जिज्ञासा जगाई गई। मतलब यहाँ भी प्रभावित करने वाले निहित कारक और उनकी भूमिका रही। 
खैर, जब ये महिला स्पष्ट तौर पर "गौड़ी लंकेश" नामक पत्रिका के माध्यम से अपने विचारधारा की लड़ाई लड़ रही थी तो ये मतलब तो बिलकुल साफ है कि वो एक पत्रकार नहीं बल्कि एक पक्षकार थी जो अपनी पत्रिका (वैसे इसे पत्रिका नहीं बल्कि निजी मुखपत्र कहना ज्यादा उचित होगा) के माध्यम से अपनी उस विचारधारा का पक्ष सामने रख रही थी जिससे वो प्रभावित थी। तथा उस विचारधारा का विरोध करती थी जिससे वो असहमत थी, और इसका माध्यम उसने अपने तथाकथित पत्रिका को बनाया हुआ था। 
अब किन्हीं अज्ञात कारणों से किसी अज्ञात व्यक्ति के हाथों उस महिला की हत्या होने के बाद, जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं उनपर गंभीरतापूर्वक विचार करने कि आवश्यकता है। अगर राजनैतिक पार्टियों ने अपने-अपने नज़रिये या लाभ-हानि की दृष्टि से इस घटना पर प्रतिक्रिया दी तो वो बात समझ में आती है। हम उनके चाल-चरित्र और व्यवहार को समझ सकते हैं। लेकिन, मीडिया समूहों की प्रतिक्रियाएँ और उनकी प्रतिक्रिया के तौर-तरीकों को अब सूक्ष्म दृष्टि से देखने और समझने की आवश्यकता है।
एक राष्ट्रीय चैनल के प्रसिद्ध पत्रकार ने इस मामले में सीधे-सीधे प्रधानमंत्री को सवालों के घेरे में लिया। एक बड़ा ही अटपटा और बेतुका सा तर्क ये था कि प्रधानमंत्री उस व्यक्ति को ट्वीटर पर फॉलो क्यों करते हैं जिस व्यक्ति ने उक्त महिला की हत्या के बाद उस महिला के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। अब कोई उन्हें ये समझाये कि यदि वो पत्रकार महोदय स्वयं जिन-जिन को फॉलो करते हैं उन सबों से उन्होने क्या कोई क़रारनामा लिखवा लिया है कि कल को वो व्यक्ति किसी तरह की अमर्यादित हरकत नहीं करेगा और कल को अगर वो ऐसा करता है तो क्या उस व्यक्ति की अमर्यादित हरकत के फलस्वरूप ये जनाब सन्यास ले लेंगे या अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे? ये क्या हो रहा है पत्रकारिता कि आड़ में? अपना पक्ष सामने रखने के लिए चाहे जिस हद तक जाना पड़े गिरते चले जाना ही पत्रकारिता है क्या?
आज हर मीडिया घराने प्रायोजित हो चुके हैं, उनकी खबरें प्रायोजित हो चुकी हैं, और साथ ही उनके खबरों को परोसने का अंदाज़ भी प्रायोजित हो चला है। ऐसे में बड़े सुनियोजित किन्तु अत्यंत ही दुखद और खतरनाक तरीके से पक्षकारिता का साया पत्रकारिता के ऊपर  गहराता जा रहा है और पत्रकारिता दिन-प्रतिदिन कुंठा की शिकार हो रही है। और जो सामने आ रहा है या दिख रहा है वह मीडियाकर्मियों की एक ऐसी जद्दोजहद है जो उनके अपने मीडिया घरानों और प्रायोजकों के पक्ष को किसी भी हाल में परोसने की विवशता से प्रभावित है।  

कवि धूमिल कि पंक्तियाँ याद आती हैं....

हमारे यहाँ लोकतन्त्र एक ऐसा तमाशा है 
जिसकी जान मदारी की भाषा है....

दुर्भाग्यवश, आज लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ अपने-अपने मदारियों के आगे विवश होता दिख रहा है।