हँसी की आंधी : राहुल गाँधी


राहुल गाँधी पर आधारित 
So Sorry
के 
तीन लाज़वाब एपिसोड 





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अटल जी के देहांत पर भी घटिया हरकत करने से बाज नहीं आये लोग

कल दिनांक 16 अगस्त 2018 की संध्या 05 बज कर 05 मिनट पर जैसे ही भारतीय राजनीति के "मर्यादापुरुषोत्तम" श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के देहावसान की खबर आयी, मानो सारा देश शोकाकुल हो गया. हर कोई व्यथित मन से उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देने में लगा हुआ था. किन्तु, ऐसे अवसर पर भी कुछ लोग ऐसे थे जो अपनी घटिया और ओछी हरकत से बाज़ नहीं आये. अटल जी के देहांत के कुछ समय बाद ही एक तस्वीर सोशल मीडिया में दिखाई जाने लगी जिसमें डॉक्टरों का एक समूह एक शव के पास गर्दन झुकाए खड़ा दिख रहा था. इन घटिया लोगों ने इसे एम्स के डॉक्टरों द्वारा अटल जी को अंतिम विदाई का बता कर सोशल मीडिया पर फैलाने शुरू कर दिया और बहुत से अनजान लोगों ने भी इस तस्वीर को अपनी ओर से खूब शेयर किया.

Fake Photos Claiming To Be AIIMS Doctors

बाद में जब इस तस्वीर की पड़ताल हुई तो पता चला की ये एक फर्जी तस्वीर थी. असल में यह तस्वीर 2012 की थी जिसमें चाइनीज़ डॉक्टरों का एक समूह एक ऐसे मरीज़ को श्रद्धांजलि दे रहे थे जिसने मृत्योपरांत अपने सभी अंग दान कर दिए थे. इस घटिया हरकत को देखने के बाद यही कहा जा सकता है कि इस देश में अभी भी ऐसे घृणित मानसिकता के लोग भरे पड़े है जिन्हें मानवीय संवेदना और संस्कारों का कोई मूल्य भी मालूम नहीं. ऐसे घटिया लोगों की जितनी भी निंदा की जाए कम ही है.
सन्दर्भ : ज़ी न्यूज़ 

भारतीय राजनीति के मर्यादापुरुषोत्तम का अटल अवसान

भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी अब नहीं रहे. अटल जी भारतीय राजनीति के एक ऐसे ध्रुवतारा के रूप में याद किये जायेंगे जिनको देख कर, भारत के अनगिनत या यूँ कहें कि वर्त्तमान भारतीय राजनीति के सभी नेताओं ने अपनी राजनैतिक दिशा और दशा का निर्धारण कभी न कभी अवश्य किया है. भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वायपेयी एकमात्र ऐसे नेता के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने कभी भी अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किसी भी तरह की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया. राजनीति की दुर्गम राहों में अटल जी ने जिस संयम और शुचिता का अनुसरण किया वो आज ही नहीं बल्कि सदैव भारतीय राजनीति में अनुकरणीय रहेंगी. 

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अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक रहे हैं. बाद में 1968 से 1973 तक वाजपेयी जी भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. पहली बार 1957 में इन्होंने गोंडा उत्तर प्रदेश से जनसंघ के प्रत्याशी के तौर पर विजयी होकर लोकसभा पहुँचे थे. 1977 से 1979 तक जनता पार्टी की मोरारजी देसाई की सरकार में इन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. फिर जनता पार्टी की कार्यशैली से असंतुष्ट होकर इन्होंने 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. राजनीति में प्रवेश से पहले अटल जी ने एक पत्रकार के रूप में भी अनेक कीर्तिमान कायम किया. उन्होंने राष्ट्रधर्म, पान्चजन्य और वीर अर्जुन जैसी राष्ट्र भावना से ओत-प्रोत पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया. एक प्रखर और ओजस्वी कवि के रूप में तो उनकी ख्याति निराली रही है. 

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16 मई 1996 को उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी किन्तु, उनकी सरकार मात्र 13 दिनों तक ही चली, और 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा था. इसके बाद संयुक्त मोर्चे की दो-दो सरकारों के गिर जाने के बाद पुनः 19 मार्च 1998 को वे दुबारा प्रधानमंत्री बने. किन्तु, 17 अप्रैल 1999 के उस ऐतिहासिक अपितु घृणित राजनीतिक घटनाक्रम  के परिणामस्वरूप मात्र 13 महीने के बाद इनकी सरकार गिरा दी गयी, जब तमिलनाडु की सुश्री जयललिता की AIADMK ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और विश्वास प्रस्ताव मत के दौरान इनकी सरकार मात्र एक वोट से बहुमत साबित नहीं कर पायी. ये एक ऐसी घटना के तौर पर भारतीय राजनीति में याद की जाती है कि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने मात्र एक वोट से सरकार गिर जाने दी, किन्तु किसी अनैतिक विकल्प का सहारा नहीं लिया. और तब 1999 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव हुए और फिर 13 अक्टूबर 1999 को अटल जी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया. यह सरकार कई मायनों में अभूतपूर्व रही. ये पहली गैर-काँग्रेसी सरकार थी जिसनें 5 सालों का कार्यकाल पूरा किया.

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उनके आखिरी कार्यकाल में उनकी सरकार द्वारा किये गए कार्यों ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों ही बदल के रख दी. अटल जी स्वयं को कभी राजनीति के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे किन्तु उनका अभूतपूर्व राष्ट्रधर्म ही उन्हें राजनीति में खींच लाया. 25 दिसंबर 1924 को जन्में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने आज 16 अगस्त 2018 को शाम 05 बजकर 05 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली. एक सम्पूर्ण निर्विवाद राजनैतिक जीवन जीने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी का जीवन और जीवन दर्शन भारतीय राजनीति को जीवन भर प्रेरणा देता रहेगा. राजनीति में जिस संयम, शुचिता और मर्यादा का पालन अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया उसे देखते हुए यदि उन्हें भारतीय राजनीति का मर्यादापुरुषोत्तम कहा जाए तो ये कदापि अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारतीय राजनीति के अटल सत्य रहे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को भावभीनी श्रद्धांजली. 

क्या हामिद अंसारी काँग्रेस के एहसानों का क़र्ज़ अदा कर रहे हैं

जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं काँग्रेस पार्टी अपने मूल चरित्र (मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति) को अपनाने के लिए मजबूर होती दिख रही है, अभी हाल के दिनों में जो बयानों की श्रृंखला काँग्रेस के नेताओं की ओर से जारी हुई है उनसे तो कम से कम ऐसा ही लगता है. तथाकथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों से राहुल गाँधी की मुलाक़ात, उसके बाद राहुल गाँधी का ऐलान कि "हाँ--काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी है", और इसके बाद तो बयानों की जो श्रृंखला शुरू हुई तो ऐसा लगा मानों हर कांग्रेसी आपस में ये होड़ लगा रहा था कि मेरा बयान उसके बयान से ज्यादा बेहतर तरीके से साबित करता है कि मुसलमानों की सबसे बड़ी हितैषी काँग्रेस ही है कोई और नहीं. ये बताने की ज़रुरत नहीं कि जब-जब ऐसे संकीर्ण मानसिकता से ओत-प्रोत बयान दिए जाते हैं तो इसका फायदा सबसे ज्यादा उठाने वाले लोग और कोई नहीं बल्कि देश की विघटनकारी ताकतें ही होती हैं.

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काँग्रेस धर्म के नाम पर अपनी राजनीति की विसात बिछाने में कितना कामयाब हो पाएगी या हो पायी है ये तो अभी बताया नहीं जा सकता, लेकिन विघटनकारी शक्तियों ने इसका भरपूर फायदा उठाना शुरू कर दिया. और, इसी के परिणामस्वरूप, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का वो बयान सामने आया जिसमें उसने पूरे देश के हर जिले में मुस्लिम शरिया अदालत खोले जाने की मांग कर दी. इस मांग के आते ही जम्मू कश्मीर के डिप्टी ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम का कहना कि भारत सरकार यदि मुसलामानों को शरिया अदालत खोलने की अनुमति नहीं देता तो फिर उन्हें एक अलग मुल्क बनाकर दे दिया जाए. अभी इन बयानों का शोर थमा भी नहीं था कि भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति मो० हामिद अंसारी जो 2007 से 2017 तक भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हैं, उनका भी एक बयान आ गया कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कि मांग जायज़ है और सरकार को इसे मानने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. 

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ऐसा पहली बार नहीं है, हामिद अंसारी इसके पहले भी कितने ही ऐसे विवादित बयान दे चुके हैं. उप राष्ट्रपति पद से हटने के तुरंत बाद भी उनका एक बयान आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और मुस्लिम अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. किन्तु, इस बार उनका बयान एक ऐसे मांग के समर्थन में  आया है जिसे किसी भी रूप में संवैधानिक नहीं कहा जा सकता. और, एक अति उच्च संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से इस तरह के असंवैधानिक मांग का समर्थन कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. राजनयिक से राजनेता बने हामिद अंसारी के ऊपर काँग्रेस के एहसानों की सूची बहुत लम्बी है और, ये बात सर्वविदित भी है. अभी हाल ही में इनका एक और शर्मसार करने वाला बयान आया है -- जिसमें उन्होंने शशि थरूर के बयान को ही दुसरे शब्दों में दोहराया है, उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसा लग रहा है कि "भारत हिंदुत्व के सिद्धांतों पर आधारित एक अनुदार और जातीय मूल्यों पर केन्द्रित लोकतंत्र बनने की राह पर है."** तो क्या काँग्रेस को खुश करने के लिए भाजपा का किसी भी हद तक जाकर विरोध करना इनकी मजबूरी है? या फिर हामिद अंसारी राजनीति कीअपनी दूसरी पारी के लिए ज़मीन तैयार करना चाहते हैं?  ऐसे में ये सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या हामिद अंसारी राजनीति की दूसरी पारी खेलने के लिए बेचैन हो रहे हैं या फिर, काँग्रेस के एहसानों का क़र्ज़ अदा कर रहे हैं..???

** https://www.firstpost.com/india/hamid-ansari-warns-india-could-become-illiberal-and-ethnic-democracy-based-on-principles-of-hindutva-4764561.html

काँग्रेस ने 2019 के लिए खुद को पूरी तरह से हरा रंग डाला

चार दिन पहले राहुल गाँधी का मुसलमान बुद्धिजीवियों से गुप्त मीटिंग करना, उक्त मीटिंग में मुसलमान बुद्धिजीवियों से कथित रूप से गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान मंदिरों में जाने को लेकर माफ़ी मांगना और उन्हें आश्वस्त करते हुए ये ऐलान करना कि हाँ--काँग्रेस मुसलमानों की ही पार्टी है. उसके एक दिन बाद मुसलमानों की संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा देश भर में शरिया क़ानून लागू करने की मांग करना, और इसके एक दिन बाद काँग्रेस के बड़े और बुद्धिजीवी समझे जानेवाले नेता शशि थरूर द्वारा ये कहा जाना कि यदि 2019 के चुनाव में भाजपा इसी तरह पूर्ण बहुमत से दुबारा जीतती है तो देश का संविधान खतरे में आ जाएगा और भारत एक "हिन्दू - पाकिस्तान" में तब्दील हो जाएगा. फिर, इसके एक दिन बाद काँग्रेस द्वारा शशि थरूर के बयान से किनारा करना कि ये उनके निज़ी विचार हैं और काँग्रेस का इससे कुछ लेना-देना नहीं. क्या ये सब अलग-अलग घटनाएं हैं और इनका आपस में कोई सम्बन्ध या लेना-देना नहीं? अगर इत्तेफाक से आप ऐसा ही सोचते हैं तो शायद आप गलत हैं. 


दरअसल, ये सारी घटनाएं एक-दुसरे से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं और काँग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं.  काँग्रेस पार्टी को आगामी चुनाव में न तो किसी पार्टी से सहयोग का भरोसा है, न ही उसके पास अपना खुद का इतना जनाधार बचा है कि वो अपने अकेले के दम पर आगामी 2019 का चुनाव लड़ सके. काँग्रेस के महागठबंधन की परिकल्पना भी काँग्रेस के खुद के हक़ में नहीं हो पा रही थी. क्योंकि, यदि महागठबंधन बन भी  जाता तो उसमें काँग्रेस की हैसियत एक पिछलग्गू से अधिक की नहीं होती. ऐसी स्थिति में, काँग्रेस को महागठबंधन की अनिश्चितता से उबारने या फिर महागठबंधन में अपनी हैसियत बढाने और अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण के सिवा दूसरा और कोई विकल्प बचा ही नहीं था. और, इस काम में उसे साथ देने के लिए नए सहयोगी तलाशने की ज़रुरत नहीं थी. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से काँग्रेस का रिश्ता बहुत ही पुराना रहा है.


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस मांग को जम्मू और कश्मीर के डिप्टी ग्रैंड मुफ़्ती नासिर उल इस्लाम ने सीधे हाथों से लपकते हुए एक कदम आगे बढ़ते हुए ये बयान दे डाला कि अगर भारत में रहनेवाले मुसलामानों को शरिया अदालत बनाने की इजाज़त नहीं दी जाती, तो उन्हें एक अलग मुल्क बनाकर दे दिया जाए. बात यहीं पर नही रुक रही. भाजपा ने जहाँ इन तमाम बातों को देशविरोधी, हिंदुविरोधी और साम्प्रदायिक सौहाद्र को भंग करने वाला बताते हुए इसका ज़बरदस्त विरोध किया है, वहीं पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने AIMPLB की मांग को जायज़ ठहराते हुए आग में घी डालने का काम कर दिया है. तो ऐसा करके क्या हामिद अंसारी काँग्रेस के एहसानों का क़र्ज़ अदा कर रहे हैं ? ज़रूर पढ़िए हमारा अगला पोस्ट.
काँग्रेस की इन सारी कवायदों का उसे कितना लाभ मिलेगा ये तो आने वाले चुनाव परिणामों से ही पता चलेगा लेकिन, हमने अपने 6 अप्रैल के पोस्ट में जो आशंका जताई थी वो तो अभी से ही सच होती दिख रही है.
जरूर पढ़ें -- 2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है

ये भी पढ़ें --  हाँ, काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी : राहुल गाँधी 

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हाँ, काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी : राहुल गाँधी

2019 के चुनावों की आहट अभी ठीक से सुनी भी नहीं गयी लेकिन, काँग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की बेचैनी, बौखलाहट और बदहवासी एकदम से उभर कर सामने आने लग गयी है. अपने अजीबोगरीब बयानों और हरकतों से काँग्रेस की बची-खुची साख को भी रसातल तक पहुँचाने वाले काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के एक और अजीबोगरीब बयान की खबर आज उर्दू अखबार इंक़लाब और सियासत डॉट कॉम नामक वेबसाइट पर छपी है. इस खबर के अनुसार काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा है कि -- हाँ, काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी है. यही उस खबर की हैडलाइन भी है. उक्त खबर की पुष्टि के लिए यहाँ क्लिक करें

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उर्दू अखबार इंक़लाब और सियासत डॉट कॉम की उक्त खबर के अनुसार -- मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को भुलाते हुए काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा कि हाँ, काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी है क्योंकि, देश में मुसलमान कमजोर हैं और काँग्रेस हमेशा से कमजोर वर्ग के साथ रहती है. काँग्रेस पार्टी के अन्य नेताओं के भी हालिया बयानों को देखें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि भाजपा के ऊपर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पार्टी का आरोप लगाने वाली काँग्रेस ने खुद ही साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत कर दी है. दो दिन पूर्व ही राहुल गाँधी का मुस्लिम बुद्धिजीवियों से गुप्त मुलाक़ात का विवाद थमने से पहले ही राहुल गाँधी का ये बयान 2019 चुनावों में काँग्रेस की रणनीति का बड़ा खुलासा है.

ये भी पढ़ें 2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है  

भ्रमास्त्र : 2019 के लिए काँग्रेस का नया अस्त्र - 2



भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में कितनी अंधी हो चुकी है काँग्रेस आज इस पोस्ट में शीर्षक के मुताबिक़ काँग्रेस के एक और झूठ की पोल खुलने की पूरी जानकारी आप सबों के समक्ष प्रस्तुत है. बात पिछले सात जुलाई कि है, जब काँग्रेस आईटी सेल प्रमुख दिव्या स्पंदना ने अपने ऑफिसियल ट्विटर हैंडल से एक फर्जी वीडियो को यह बताते हुए अपलोड किया कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जयपुर रैली की विडियो है जिसमें लोग शोर मचाते हुए उनका विरोध कर रहे हैं. 

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ट्विटर पर इस वीडियो को अपलोड करते हुए दिव्या ने फेसबुक पर भी तंज कसा और लिखा कि इस वीडियो को कुछ अजीब कारणों से फेसबुक पर अपलोड नहीं कर पा रही हूँ, क्या आपलोग कोशिश करेंगे और ट्वीट करेंगे ये नरेन्द्र मोदी की आज की जयपुर रैली का वीडियो है. साथ ही उसने इस वीडियो को डाउनलोड करने का लिंक भी दिया. कुछ ही देर बाद इस विडियो को काँग्रेस पार्टी के ऑफिसियल ट्विटर हैंडल से भी फेसबुक पर यह ताना मारते हुए अपलोड किया कि "अरे हम अपने फेसबुक के पेज पर यह वीडियो अपलोड नहीं कर पा रहे हैं, क्या आप बताएँगे क्यों? या हमें रविशंकर प्रसाद से बात करनी चाहिए?
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वैसे, बाद में उन्होंनें ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए और फेसबुक का धन्यवाद करते हुए ये भी ट्वीट किया कि हम इस वीडियो को फेसबुक पर भी अपलोड करने में सफल रहे.

INC_Tweets_Successful_Upload_Of_Fake_Video_On_Facebook

इस वीडियो को ट्विटर पर फैलते देर नहीं लगी और कांग्रेसी चाटुकारों ने पूरी तत्परता के साथ इस वीडियो वाले ट्वीट को रि-ट्वीट करना भी शुरू कर दिया. अगले ही दिन इसकी भनक भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को लगी और उन्होंनें बिना देर किये इस बात का पर्दाफ़ाश किया कि ट्वीटर पर काँग्रेसियों द्वारा प्रचारित किया जाने वाला वीडियो फर्ज़ी है और ये खुलासा किया कि ये वीडियो मार्च 2018 का है जब प्रधानमंत्री मोदी झुंझुनू (राजस्थान) में भाजपा कार्यकर्ताओं की सभा में पहुंचे थे. ये उस वक़्त भाजपा के पार्टी कार्यकर्ताओं के आपसी झड़प का वीडियो है. ऐसा वीडियो को देख कर समझा भी जा सकता है. वीडियो का लिंक पोस्ट के अंत में दिया गया है.

Fake_Video_Upload_By_INC_Unveiled

जैसे ही अमित मालवीय ने ये खुलासा किया काँग्रेस सकते में आ गयी और सबसे पहले राहुल गाँधी ने इस ट्वीट को अपने हैंडल से डिलीट कर दिया. पर, काँग्रेस के ऑफिसियल हैंडल @INCIndia और काँग्रेस आईटी सेल प्रमुख दिव्या स्पंदना के ट्विटर हैंडल @divyaspandana से इसे डिलीट नहीं किया गया. काँग्रेस ने अपने ऑफिसियल ट्विटर हैंडल @INCIndia पर इसके लिए माफ़ी मांगी और बेशर्मी के साथ लिखा कि...उफ्फ..ये वीडियो जयपुर में नहीं बल्कि झुंझुनू में लिया गया था, जहाँ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री मोदी उपस्थित थे, और भाजपा के कैडर आपस में लड़ पड़े थे.

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वैसे काँग्रेस ने बिना माफ़ी मांगे अपनी गलती को तो क़ुबूल कर लिया लेकिन काँग्रेस की आईटी प्रमुख दिव्या स्पंदना ने तो मानो बेशर्मी की साड़ी हदें ही पर कर दी और माफ़ी भी मांगी तो इस तंज के साथ --- माफ़ी चाहती हूँ ऐसा लग रहा है मनो वीडियो कल का नहीं बल्कि पिछले मार्च का है...हे भगवान् तो क्या राजस्थान भाजपा इतना पहले ही लुट चुकी थी.??

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अब ऎसी बेशर्मी की तो काँग्रेस से उम्मीद नहीं ही थी. तो क्या...अब ये मान लिया जाए कि काँग्रेस अब इतनी लाचार हो चुकी है उसके पास अब झूठ और भ्रम फैलाने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचा ??? क्या करोड़ों रुपये खर्च करके काँग्रेस अपना आईटी सेल इसी तरह के झूठ और भ्रम का माहौल बनाने के लिए तैयार किया है...??? वैसे आप भी इस वीडियो को देखें और तय करें. विडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें 

हमारी कोशिश है कि अब आगे से काँग्रेस के द्वारा फैलाए जा रहे झूठों का जितना संभव हो सके पर्दाफाश करें और उसे आप सबों की नज़रों में ला सकें. इसके लिए "भ्रमास्त्र : २०१९ के लिए काँग्रेस का नया अस्त्र" एक धारावाहिक श्रृंखला के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है और ये इस कड़ी का दूसरा पोस्ट है.


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इंदिरा गाँधी को जेल से छुड़ाने के लिए विमान का अपहरण तक किया गया

आज भारतीय राजनीति में नैतिकता और शुचिता की बात करने वाली काँग्रेस के आपराधिक चरित्र के इतिहास के बारे में आज भी बहुत कम लोग ही जानते हैं. आज बात करते हैं उस विमान अपहरण की जिसका उद्देश्य 1978 के जनता पार्टी के शासनकाल में जेल में बंद तत्कालीन विरोधी दल की नेत्री इंदिरा गाँधी को जेल से छुड़ाना और उनके पुत्र संजय गाँधी के ऊपर लगे सभी केसों को ख़त्म करना था. 

Indira Gandhi And Sanjay Gandhi

जी हाँ...20 दिसंबर 1978 को इंडियन एयरलाइन्स के यात्री विमान IC 410 का अपहरण भोलानाथ पाण्डेय और देवेन्द्र पाण्डेय नामक दो व्यक्तियों ने कर लिया था और उनकी मांग थी कि जेल में बंद इंदिरा गाँधी को जेल से रिहा किया जाए और उनके पुत्र संजय गाँधी के ऊपर चल रहे सभी केस वापस ले लिए जाएँ. बाद में भोलानाथ पाण्डेय और देवेन्द्र पाण्डेय को उनकी इस सेवा के लिए पुरस्कार के स्वरुप विधान सभा के टिकट भी दिए गए. भोलानाथ पाण्डेय दो बार दोआबा, बलिया से विधान सभा के लिए चुने गए गए. बाद में उन्हें इंडियन यूथ काँग्रेस का महासचिव भी बनाया गया. देवेन्द्र पाण्डेय भी हाल तक उत्तर प्रदेश काँग्रेस कमिटी के महासचिव रहे हैं. इस पूरे घटना क्रम के बारे में आप विकिपीडिया के इस लिंक पर क्लिक कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. इसके अलावा आप यहाँ भी क्लिक कर जानकारी ले सकते है. 


भ्रमास्त्र : 2019 के लिए काँग्रेस का नया अस्त्र

जी हाँ...सही समझा आपने यदि आपने भी इसे "भ्रमास्त्र" ही समझा है तो. काँग्रेस इस "भ्रमास्त्र" के सहारे ही आगामी 2019 के चुनावी महासमर में उतरने की तैयारी में है. काँग्रेस की तरफ से इसकी बाकायदा शुरुआत भी हो चुकी है. आइये देखें और समझें कैसे? जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, काँग्रेस के नेता बदहवासी और बेसुधी की स्थिति में आते जा रहे हैं. आये दिन किसी ना किसी काँग्रेसी नेता का कोई न कोई बयान या ट्वीट आ जाता है जिससे भाजपा के खिलाफ झूठ और भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है. अभी कुछ दिन पहले ट्वीटर पर काँग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का एक ट्वीट आया था जिसमें पाकिस्तान के एक पुल को भोपाल का निर्माणाधीन पुल बताकर भ्रम फैलाने की कोशिश की गयी थी.

Fake Image Posted By Digvijay Singh Congress

जैसे ही दिग्विजय सिंह ने ये ट्वीट किया, अखबारों ने भी इस ट्वीट को एक खबर की तरह प्रकाशित कर दिया और अचानक से एक बड़े झूठ को और भी ज्यादा फलने-फूलने का मौका मिल गया. ट्वीटर और फिर अखबारों के माध्यम से ये झूठ देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गया. देखिये, क्या लिखा था दिग्विजय सिंह ने अपने ट्वीट में.
Misleading Tweet Of Digvijay Singh Congress

बाद में, ट्वीटर के ही एक यूजर ने इस झूठ का पर्दाफाश किया और बताया कि ट्वीट में दिखाई गयी तसवीरें फर्जी हैं. लेकिन, काँग्रेस की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. आज तक दिग्विजय सिंह ने इस ट्वीट के लिए न तो माफ़ी मांगी न ही उन्होंने इसे डिलीट ही किया. वैसे, माफी मांग लेने या डिलीट कर देने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि, जितना भ्रम फैलना था वो तो फ़ैल गया. जिस तादाद में इनकी ओर से ये भ्रम फैलाए जा रहे हैं, तो ये संभव नहीं कि उनके हर झूठ को समय रहते बेनकाब भी किया जा सके. तथापि, हमारी कोशिश है कि अब आगे से काँग्रेस के द्वारा फैलाए जा रहे झूठों का जितना संभव हो सके पर्दाफाश करें और उसे आप सबों की नज़रों में ला सकें. इसके लिए "भ्रमास्त्र : २०१९ के लिए काँग्रेस का नया अस्त्र" एक धारावाहिक श्रृंखला के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा.


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काँग्रेस का हाथ लश्कर के साथ

जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गठबंधन टूटने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. और राष्ट्रपति शासन के लगते ही सेना ने आतंकवादियों से निपटने की अपनी तैयारियों को पुख्ता करते हुए एक्शन में आ गयी.  सेना की गतिविधियों के शुरू होते ही आतंकियों और अलगाववादियों में हड़कंप मचना स्वाभाविक था, जो शुरू हो गया. पर जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है वो है देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी का दहशत में आना या फिर दहशतगर्दों का समर्थन करना. हाल ही में काँग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने सेना के ऊपर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में चार आतंकी के साथ 20 निर्दोष लोगों को मारा जा रहा है. इसके तुरंत बाद लश्कर की ओर से आतंकी महमूद शाह ने बयान देते हुए राष्ट्रपति शासन की न सिर्फ निंदा की बल्कि लिखित बयान जारी कर बाकायदा गुलाम नबी आज़ाद का नाम लेते हुए समर्थन किया और कहा कि जम्मू और कश्मीर के मामले में उनका भी स्टैंड वही है जो काँग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद तथा अन्य काँग्रेस नेताओं का है. 


यूँ तो गुलाम नबी के इस बयान और उसके बाद आये लश्कर के समर्थन को लेकर भाजपा के सभी नेताओं ने अपना आक्रोश जाहिर किया है. लेकिन, जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि देश की बाँकी विपक्षी पार्टियों ने  इस मामले में एक मतलबी चुप्पी साध राखी है. तो, क्या अब ये मान लिया जाए कि राजनीति और सत्ता पाने के लिए देश के विपक्ष को देशद्रोहियों से हाथ मिलाने और उनकी भाषा बोलने में भी कोई शर्म या गुरेज नहीं है? किसी को भी बुरा नहीं लग रहा कि गुलाम नबी के एक बयान ने देश के दुश्मनों को कितनी ताक़त दी है?  बहरहाल,भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने इस बयान की बाबत क्या कहा आप भी देखें.


वैसे बताते चलें कि आतंकियों पर नकेल कसने के लिए दो विशेष अधिकारी बी वी आर सुब्रमण्यम और विजय कुमार को जम्मू-कश्मीर बुलाया गया है. सुब्रमण्यम कि गणना देश के एक ऐसे योग्य अधिकारी के रूप में होती है जिन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शान्ति स्थापित करने का खासा अनुभव है और विजय कुमार के नेतृत्व वाली टीम ने ही दक्षिण के मशहूर और कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन का अंत किया था. सुब्रमण्यम को जम्मू कश्मीर राज्यपाल का  मुख्य सचिव तथा विजय कुमार को राज्यपाल का मुख्य सलाहकार बनाया गया है.

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इन विशेष अधिकारियों, सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान और प्रयास घाटी में कितने कारगर होंगे तथा जम्मू-कश्मीर की समस्या का समाधान किस हद तक संभव हो सकेगा ये अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन, देश के सामने देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी काँग्रेस का जो वीभत्स चेहरा उजागर हुआ है वो वाकई चिंता में डालने वाली है. और इससे भी ज्यादा चिंता में डालनेवाली है उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की खामोशी जो कभी मोमबत्ती तो कभी तख्ती लेकर देश और दुनिया को ये बताने के लिए आतुर रहते हैं कि हमारे यहाँ कितनी असहिष्णुता बढ़ रही है?


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आखिर क्यों जरूरी हुआ कश्मीर में सत्ता से संधि-विच्छेद

जम्मू कश्मीर में सरकार से भाजपा के समर्थन वापस लेते ही केंद्रीय सुरक्षा बल पूरी तरह से सक्रिय हो गया और ऑपरेशन ऑल आउट के तहत 180 आतंकियों की हिट-लिस्ट तैयार कर उस पर एक्शन शुरू कर दिया. तो क्या यही वज़ह थी भाजपा द्वारा सरकार से समर्थन वापसी की जिसे सरकार में रहते हुए अंजाम नहीं दिया जा सकता था? क्योंकि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का अलगाववादियों के प्रति नरम या फिर सहयोगी रवैया इसमें आड़े आ रहा था. या कुछ और भी था जो भाजपा को अन्दर ही अन्दर परेशान कर रही थी.

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कठुआ मामले में जम्मू के डोगरा हिन्दुओं के विरुद्ध एकतरफा कार्रवाई और उनका निरंतर अपमान और प्रताड़ना के फलस्वरूप हिन्दुओं में उपजा आक्रोश.

जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड में 400 से अधिक मुसलमानों की बहाली का मामला.

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आईएसआईएस की हिमायती "जमियत अहले हदीस" को श्रीनगर में ईदगाह बनाने हेतु तकरीबन साढ़े छः एकड़ जमीन देने का निर्णय.

200 करोड़ की लागत से इस्लामिक विश्वविद्यालय बनाने की योजना.

अलगाववादियों और विद्रोहियों के पक्ष में एकतरफा सीजफायर के लिए दवाब डालना.

अब इतने विरोधाभासों के साथ-साथ देश और हिंदु हितों की अनदेखी भाजपा कैसे बर्दाश्त कर सकती थी. सो, हो गया सत्ता से संधि-विच्छेद.

अब, जबकि भाजपा ने जम्मू और कश्मीर की सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है, भाजपा की और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वो सुनिश्चित कर सके कि समय रहते जम्मू और कश्मीर में शान्ति कायम करने और धार्मिक भेदभाव समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये जाएँ.

यूँ तो, शुरूआती दौर में ऐसा लग रहा है कि सेना को दवाबमुक्त होकर काम करने के निर्देश दिए जा चुके हैं. लेकिन अन्य सभी मामलों में भाजपा को कड़ी अग्निपरीक्षा का सामना करना होगा जो कि काफी चुनौतीपूर्ण भी है.







क्या भाजपा ने अपने गले की हड्डी निकालकर विरोधियों के गले में डाल दी है

कश्मीर में राजनीती ने एक बार फिर से नयी करवट ली है और तीन सालों से चली आ रही पीडीपी और भाजपा गठबंधन की सरकार गिर गयी. राजनीति के लिए गठबंधन सरकारों का बनना और गिरना कोई नयी या बड़ी बात नहीं है. लेकिन, कश्मीर में बनी गठबंधन की सरकार और आज उस गठबंधन के टूट जाने की घटना को एक सामान्य राजनैतिक घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता. कश्मीर में भाजपा का पीडीपी को समर्थन देकर सरकार बनाना भी एक बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम था. किन्तु, तीन सालों के बाद भाजपा द्वारा पीडीपी से समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरा देना उससे भी बड़े महत्त्व की घटना है.

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भाजपा के इस निर्णय की अनेकों व्याख्याएं की जायेंगी और अनेकानेक राय व्यक्त किये जायेंगे. लेकिन, ये तय है कि अपने इस कदम से भाजपा ने एक साथ कई निशाने साधने की चाल चल दी है और विरोधियों को अनायास ही बिलकुल हक्का-बक्का कर दिया है. बेशक, विरोधी कुछ भी बोलें लेकिन भाजपा के इस कदम से उनकी आधी जुबान उनके हलक में अटक सी गयी है. अगर यही परिस्थिति किसी अन्य राज्य में होती तो अब तक दूसरी पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने की कवायद शुरू हो गयी होती. पर, यहाँ सभी ने अपने हाथ-पैर पीछे खींच लिए हैं और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है. भाजपा न सिर्फ ये सन्देश देने में सफल हुयी है कि वो सत्ता के लिए देश कि अस्मिता और सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकती बल्कि हिन्दू हितों के लिए भी अपनी प्रतिबद्धता साबित करने में सफल हुई है. कैसे पढ़ें अगले पोस्ट में. यहाँ क्लिक करें.

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ऐसा करके भाजपा ने न सिर्फ अपने गले में फंसी हड्डी निकाल फेंकी है बल्कि वही हड्डी उसने विरोधियों के गले में डाल दी है जो उनके लिए न तो निगलते बन रहा है न उगलते. अब एक तरफ वो सत्ता की लोभी कहलाने से बच गयी तो दूसरी तरफ अब अपने सारे एजेंडे को संवैधानिक तरीके से बिना किसी राजनैतिक दबाव के पूरा करवा सकती है. विरोधी नेशनल कांफ्रेंस नेता अब्दुल्ला ने तो सरकार गिरने के तुरंत बाद ही दुबारा चुनाव कराये जाने की मांग कर दी, लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं होने देगी. अब कश्मीर एक बार पुनः राष्ट्रपति शासित प्रदेश होगा, जो वहां के अलगाववादियों और हिंदु विरोधी ताक़तों के लिए गंभीर चिंता और दहशत का कारण हो सकता है. जम्मू और कश्मीर में लगा ये राष्ट्रपति शासन पूर्व के सभी राष्ट्रपति शासनों से भिन्न है और इसके मायने भी बिलकुल ही अलग हैं.  


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क्या कहा एच॰ डी॰ कुमारस्वामी ने प्रधानमंत्री के फ़िटनेस चैलेंज पर

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का वो ट्वीट जिसमें उन्होंने क्रिकेटर विराट कोहली के फ़िटनेस चैलेंज को स्वीकार करते हुये अपने प्रातःकालीन व्यायाम और योगाभ्यास के वीडियो को शेयर किया वो सोशल मीडिया पर खासा लोकप्रिय हो चुका है। अब तक लाखों लोग उस वीडियो को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लैटफ़ार्म पर देख और पसंद कर चुके है। इस वीडियो को सोशल मीडिया पर जारी करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम आईपीएस अधिकारियों के साथ-साथ कर्नाटक के नव-नियुक्त मुख्यमंत्री एच॰ डी॰ कुमारस्वामी को भी इसके लिए चैलेंज कर दिया। 

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प्रधानमंत्री मोदी की ओर से ये फ़िटनेस चैलेंज मिलने के थोड़ी देर बाद ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी ने अपनी प्रतिक्रिया ट्वीटर पर पोस्ट किया। यूँ तो उन्होंने प्रधानमंत्री के चैलेंज को स्वीकार तो नहीं किया पर उन्होंने प्रधानमंत्री को अपने जवाब में लिखा कि :  
"मैं सम्मानित हुआ, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरे स्वास्थ्य का ख्याल किया। मैं भी शारीरिक फ़िटनेस के महत्व में यकीन करता हूँ। और आपके उद्देश्य का समर्थन भी करता हूँ। योग और ट्रेडमिल का अभ्यास मेरी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा हैं। 
वैसे, मैं अभी अपने राज्य के विकास और फ़िटनेस के लिए ज्यादा चिंतित हूँ और इसके लिए आपके सहयोग की उम्मीद करता हूँ।"
मतलब, अवसर मिलते ही राजनीति करने का मौका नहीं चूके  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी। 

क्या खास है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के फ़िटनेस वीडियो में


पिछले दिनों खेल जगत से आए हुये खेल एवं सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने फ़िटनेस चैलेंज नामक एक परंपरा शुरू की थी। इसके बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों ने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये दूसरों को भी चैलेंज करना शुरू किया। इसी क्रम में कुछ दिन पहले क्रिकेटर विराट कोहली ने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने विराट के चैलेंज को स्वीकार किया था और आज उन्होंने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये इस चैलेंज को पूरा किया।

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इस फ़िटनेस वीडियो को शेयर करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया और लिखा "ये मेरे प्रातःकालीन व्यायाम के क्षण हैं। योग के अलावा मैं एक ऐसे स्वनिर्मित पथ पर पैदल भी चलता हूँ जिसकी प्रेरणा जीवन के पंचतत्व हैं - भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश।  यह अत्यंत ही ताज़गीदायक और कायाकल्प करने वाला है। मैं श्वसन के अभ्यास भी करता हूँ।" 


अपने इस पोस्ट को शेयर करने के बाद उन्होंने देश के सभी आईपीएस अधिकारियों के अलावा कर्नाटक के नव-नियुक्त मुख्यमंत्री  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी और 2018 कॉमनवैल्थ गेम की सर्वाधिक स्वर्ण विजेता मनिका बत्रा को भी इस फ़िटनेस चैलेंज को स्वीकार करने का न्यौता दिया। 
यूँ तो 67 वर्षीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की इस पहल का सबों ने स्वागत किया है और इसे प्रेरणादायक बताया है लेकिन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच॰ डी॰ कुमारस्वामी, प्रधानमंत्री श्री मोदी को धन्यवाद देते हुए इस पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आए।


आखिर क्यों राजनीति के विदूषक बनते जा रहे हैं राहुल गाँधी

बचपन के दिनों में गणित विषय के एक प्रश्न ने न जाने कितने ही छात्रों  के दिमाग को चकरघिन्नी की तरह घुमाया होगा। और वो प्रश्न था : 
एक बंदर बिजली के एक चिकने खंबे पर एक मिनट में 4 फिट ऊपर चढ़ता है और दूसरे मिनट में 3.5 फिट नीचे फिसल जाता है, अगर खंबे की ऊँचाई 42 फिट है तो बंदर को खंबे पर चढ़ने में कितना समय लगेगा ?  
वार्तमान समय में यह प्रश्न राहुल गांधी के संदर्भ में पूछा जा सकता है। आखिर राहुल गाँधी नेता कब बन पाएंगे? क्योंकि जहाँ कांग्रेस उन्हें नेता बनाने के लिए ज़ोर लगा रही है वे जोकर (विदूषक) बनते जा रहे है। पिछले कई सालों से राहुल गाँधी को नेता बनाने में कांग्रेस ने करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, ये बात सर्वविदित है। कई पी॰ आर॰ एजेंसियों ने राहुल गाँधी की इमेज ग्रूमिंग का जिम्मा लिया हुआ है। खुद कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी राहुल के कैरियर सँवारने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हुआ है। लेकिन इन सबों के बावजूद राहुल गाँधी ने मानों सबों को गलत और फ़ेल साबित करने का ठान लिया है। 
इतने सारे सामूहिक प्रयासों के बावजूद वो नेता बन पाये या नहीं ये तो वक़्त बताएगा लेकिन, राजनीति के विदूषक के रूप में वो ख़ासी ख्याति पाते जा रहे हैं। 


अभी हाल ही में उनके भाषण  का एक वीडियो सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमे वो बता रहे हैं कि, कोका कोला कंपनी का मालिक पहले अमरीका में शिकंजी बेचता था, मैक-डोनाल्ड कंपनी का मालिक पहले ढाबा चलाता था, तथा फोर्ड और मर्सिडीज कंपनियों के मालिक भी पहले मैकेनिक थे। 
राहुल गाँधी वहाँ उपस्थित लोगों को बताना छह रहे हैं कि ये सारे लोग सफल हो गए क्योंकि अमरीका कि सरकारों ने इन लोगों कि प्रतिभा का सम्मान करते हुये उन्हें हरसंभव मदद की। और भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार में ऐसा संभव नहीं हो रहा क्योंकि नरेंद्र मोदी योग्य और प्रतिभाशाली लोगों की मदद नहीं करना चाहते बल्कि ये तो उन्हें पीछे धकेलने में यकीन करते हैं। 



इस वीडियो के वायरल होते ही राहुल का मज़ाक उड़ाने की तो मानो होड़ सी लग गई सोशल मीडिया में। देश ही नहीं विदेशों में भी हर कोई अपने-अपने तरीके से इस भाषण पर मज़े लेता हुआ दिखा। लेकिन, इस मज़े लेने की होड़ में शायद लोगों ने उन गंभीर आरोपों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया जो राहुल गाँधी ने वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए। वैसे तो राहुल की बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता किन्तु इस वीडियो को ध्यान से देखने-सुनने के बाद एक बात तो निश्चित रूप से साबित हो जाती है कि या तो राहुल पूरे देश को मूर्ख समझते हैं या फिर वे स्वयं महामूर्ख हैं। 

शाबास कल्पना हमें तुम पर नाज़ है

ऊँची उड़ान के लिए बड़े पंखों की नहीं बल्कि परवाज़ के बड़े हौसले की जरूरत होती है. और इसे साबित कर दिखाया है बिहार के अत्यंत ही छोटे और संभवत: सबसे नये जिले शिवहर की कल्पना ने. मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित राष्ट्रीय योग्यता सह प्रवेश परीक्षा NEET-2018 में संपूर्ण भारत में प्रथम स्थान प्राप्त कर कल्पना ने न सिर्फ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया बल्कि ये साबित कर दिखाया कि प्रतिभा कभी भी किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं होती। 

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शिवहर जिले के तरियानी प्रखण्ड निवासी श्री राकेश मिश्रा की सुपुत्री कल्पना नवोदय विद्यालय, शिवहर की छात्रा रही हैं। कल्पना के पिता श्री राकेश मिश्रा, राजकीय बुनियादी विद्यालय में शिक्षक रह चुके हैं और फिलहाल डायट में कार्यरत हैं। कुल 720 अंकों वाली NEET परीक्षा में कल्पना ने 691 अंक प्राप्त किए और ये कीर्तिमान कायम कर दिया। NEET-2018 के परिणाम घोषित होने के दो दिनों बाद ही बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के 12वीं के परिणाम भी घोषित हुये और इसमें भी कल्पना ने 86.6% अंक प्राप्त कर पूरे प्रदेश में अव्वल स्थान प्राप्त किया। 
आज बिहार ही नहीं पूरे देश को इस बेटी की शानदार उपलब्धि पर नाज़ है। सारा देश इसकी प्रतिभा को सलाम कर रहा है। आइये हम और आप भी इस होनहार बेटी कल्पना पर नाज़ करें, उसे सलाम करें।  

क्या फेल हो जाएगा काँग्रेस का पेट्रोल बम

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के चार साल पूरे हो चुके और बस एक साल रह गए हैं अगले आम चुनाव में। देश कुल मिलाकर दो तबकों में बँट चुका है। एक तबका भाजपा सरकार के कामकाज से संतुष्ट नज़र आ रहा है तो दूसरे तबके की परेशानियाँ और शिकायतें थमने का नाम नहीं ले रहीं। इन दोनों तबकों की संतुष्टि और परेशानी की अनेक वजहें हैं। लेकिन, इन दोनों ही तबकों के बीच एक खास वजह है जो एक तबके के लिए जहाँ संतुष्टि का कारण है वहीं दूसरे तबके के लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब भी वही है। और वो वजह है पिछले चार सालों में एक भी भ्रष्टाचार या घोटाले का जाहिर या साबित न होना। अब चुनाव सामने है, समय कम है, विरोध भी करना है। तो, विरोध के लिए मुद्दा भी चाहिए। और अभी वो बड़ा मुद्दा बन गया है पेट्रोल की बढ़ती कीमत। 

Petrol Prices In Major Cities

इसमें कोई संशय नहीं कि बढ़ती हुई पेट्रोल की कीमतें आम जनों के लिए वाकई चिंता और परेशानी का कारण हैं। और सरकार को इसके स्थायी समाधान का रास्ता निकालने की व्यवस्था करनी भी चाहिए। लेकिन, बढ़े हुये पेट्रोल और डीजल की कीमतों के परिप्रेक्ष्य में अगर पिछली सरकार के प्रदर्शन पर गौर करें तो पता चलता है कि वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार की तुलना में पेट्रोल डीजल की कीमतों को न सिर्फ ज्यादा बेहतर और संतुलित तरीके से नियंत्रित किया है बल्कि अभी भी कीमतें पिछली काँग्रेस सरकार के अधिकतम स्तर से कम ही है। अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के ताज़ा ऑनलाइन अंक में प्रकाशित लेख तो ऐसा ही बताता है। इंडियन एक्सप्रेस की उक्त लेख को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।  

Petrol Pump

इंडियन एक्सप्रेस की उपरोक्त खबर बताती है कि पिछले रविवार को पेट्रोल की कीमतों में 10 पैसे कि वृद्धि होने के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत पिछले चार-पाँच साल के सर्वाधिक स्तर पर पहुँचकर 74.40रु/ली॰ हो गई। वैसे सितंबर 2013 में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 76.06रु/ली॰ थी। कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में भी पिछले सोमवार से ही पेट्रोल की कीमतें अपने पिछले चार साल के अधिकतम क्रमशः 77.20, 82.35 और 77.29रु/ली॰ तक पहुँच गई। वैसे कोलकाता में पेट्रोल की कीमतों का अधिकतम स्तर 78.03रु/ली॰ (अगस्त 2014) में था जबकि, मुंबई का अधिकतम 83.62रु/ली॰ (सितंबर 2013) तथा चेन्नई में सर्वाधिक 77.48रु/ली॰ (सितंबर 2013) में रह चुका है। उपरोक्त सभी आंकड़ों की सत्यता जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

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जैसा कि ऊपर देख सकते हैं, अभी कुछ दिनों पहले क्रिकेटर विराट कोहली के फ़िटनेस चैलेंज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वीकार किए जाने पर काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर चुटकी लेते हुये उन्हें फ्युल चैलेंज को स्वीकार करने की चुनौती देते हुये कहा कि :
तेलों के दाम कम करें अन्यथा कांग्रेस राष्ट्रव्यापी आंदोलन कर के आपको ऐसा करने को बाध्य करेगी।  
उक्त ट्वीट करने से पहले राहुल गाँधी ने होमवर्क किया था या नहीं या फिर हमेशा की तरह यूँ ही बोल गए ये तो पता नहीं, किन्तु जहां तक पेट्रोल का अर्थशास्त्र है, कम से कम भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से बुरा तो नहीं ही है। वैसे राहुल गाँधी को ट्विटर पर तो लोगों ने जवाब दिया ही साथ ही भाजपा आईटी सेल ने भी कुछ इस तरह जवाब दिया।

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यूँ तो ये तस्वीर बयान करती है कि काँग्रेस शासन की अपेक्षा भाजपा शासन में पेट्रोल की कीमतों में ज्यादा का उछाल नहीं आया है बल्कि कीमतें संतुलित भी रही हैं। फिर भी इस तस्वीर में बताए गए आंकड़ों की सत्यता के लिए इंडियन ऑयल की वैबसाइट को देखने से ये पता चलता है कि उक्त आंकड़े बिलकुल सही हैं। पेट्रोल की कीमत संबन्धित आंकड़ो को ऑनलाइन देखने के लिए यहाँ क्लिक करें। इन हालातों में अगर देखा जाये तो मोदी सरकार के पास वैसे भी अभी पूरा एक साल बचा है जिसमें वो कभी भी पेट्रोल/डीजल की कीमतों के परिप्रेक्ष्य में कोई बड़ा महत्वपूर्ण फैसला लेकर जनता को खुश कर सकती है। लेकिन तत्काल तो काँग्रेस का मोदी सरकार के विरुद्ध छोड़ा गया ये पेट्रोल बम फेल होता ही दिखता है। 

2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है

"मुस्लिम तुष्टीकरण" भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाये तो आज़ादी के समय से ही ऐसा होता आ रहा है, और भारत की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से अपने हानि-लाभ का ध्यान रखते हुये ऐसा करती आ रही हैं। हालाँकि ये बात दीगर है कि इतने सालों से राजनीति पोषित होने के बावजूद भी भारत के सामान्य मुसलमानों के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं आ सका है। चुनावों में फायदा लेने की नीयत से धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव अथवा तुष्टीकरण को भारत में एक जमाने से "धर्मनिरपेक्षता" का नाम दिया जाता रहा है। 

Rahul Gandhi Getting Ready For Iftar Party

अभी हाल ही में हुये कर्नाटक विधान सभा के चुनाव के परिणामों के बाद भारत की सभी विपक्षी दलों को शायद ये एहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का अकेले मुक़ाबला करने की औकात किसी भी राजनैतिक दल की नहीं। तो बेशक, वो सारी पार्टियाँ जो कभी एक-दूसरे की धुर-विरोधी थी, आज एक दूसरे के साथ हाथ-में-हाथ और कंधा-से-कंधा मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मुकाबला करने का निर्णय कर लिया। इसकी शुरुआत के तौर पर पहले कर्नाटक में सीटों के गणित में भाजपा को पछाड़ने और राज्य की सत्ता पाने के लिए जेडीएस और काँग्रेस का गठजोड़ किया। फिर इसी गणित के आधार पर हाल ही में  चौदह उपचुनाव लड़े गए जिसमें भाजपा को हराने में विपक्ष सफल हुआ। इन सारी कवायदों में बहाने के तौर पर "धर्मनिरपेक्षता" ही रही है। 


Rahul Gandhi In Muslim Costume

अब इस गठबंधन को वक़्त की आवश्यकता और तर्कसंगत बताने के लिए इन राजनैतिक पार्टियों के पास एक ही हथियार बचा है और वो है "धर्मनिरपेक्षता"। इन सभी पार्टियों की राजनैतिक विवशता है कि वो आपस में विलय नहीं कर सकते, क्योंकि इन सभी पार्टियों का जन्म ही काँग्रेस के विरोध से हुआ है और सबों के राजनैतिक आधार का मूल "मुस्लिम तुष्टिकरण" ही है। अब जबकि ये सारी पार्टियाँ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी तो ये भी तय है कि ये सारी पार्टियाँ अपने-अपने राजनैतिक भविष्य के मद्देनजर इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगी कि उनका "मुस्लिम जनाधार" उनके साथ ही रहे। और चूँकि काँग्रेस सहित गठबंधन की सभी पार्टियाँ अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं तो ये निश्चित ही है कि सबों की नज़र मुस्लिम मत-दाताओं पर सबसे खास रहने वाली है। 

political iftar party


रमज़ान का महीना चल रहा है और ऐसी संभावना है कि अगले साल के रमज़ान से पहले ही चुनाव सम्पन्न भी हो जाएँ, इस लिहाज़ से इफ्तार वाली राजनीति के साथ ही अगले चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियाँ जुट गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा इन सबों से अलग रहने वाली है। भाजपा का अपना तर्क है कि उसने जो भी विकास के कम किए हैं उसमें हिन्दू या मुसलमान में कोई भेद-भाव किए बगैर किया है, साथ ही तीन तलाक जैसे मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं के वोट के माध्यम से मुस्लिम वोटों में से अपना शेयर निकालने की कोशिश भाजपा भी उतने ही ज़ोर-शोर से करने की तैयारी में है। 

तो ऐसे में हैरत नहीं होगी कि अगले चुनाव में हर तरफ से अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा का शोर सुनाई दे।  

क्या आपकी कमजोर यादाश्त ही राजनीति की खुराक है आइये जानें LPG के बहाने

देश की राजनीति आपके ऊपर कितना प्रभाव डालती है ये बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी यादाश्त कैसी है? यकीन मानें राजनीति आपकी इसी कमजोर यादाश्त की खुराक पाकर फलती-फूलती रही है। यदि भरोसा न हो तो नीचे दिये गए तथ्यों को ध्यान से देखें, पढ़ें और समझें। आज इसे समझाने के लिए हमने उस LPG गैस को माध्यम बनाया है जिसके लिए आप को कभी सारे-सारे दिन लाईन में खड़ा रहना पड़ता था। शायद आपको ये भी याद आ जाये कि कितने दिन पहले नं॰ लगाना होता था और कितने दिनों के इंतज़ार के बाद गैस मिलता था। साथ ही, और भी कई बातें जो शायद आपको याद हो न हो।  

Que For LPG Gas Cylinder

ये पोस्ट उनके लिए भी खास है जिन्हें ये यकीन दिलाने में सारा विपक्ष दिन-रात एक किए हुये है कि वर्तमान सरकार ने जनता के हित में कुछ भी नहीं किया और उनकी रसोई महँगी हो गई है। इसे समझने के लिए पहले इस लिंक पर यहाँ क्लिक करें। इस लिंक को क्लिक करते ही आपको नीचे दिये गए तस्वीर में दिखाई गई सर्च रिज़ल्ट दिखेगी। 

LPG History 1

अब ऊपर दिये गए सर्च परिणामों में सबसे पहले तीर के निशान से इंगित किए गए लिंक नं॰ 1 को देखते ही आपको पता लगेगा कि 19 सितंबर 2012 से पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एक परिवार को एक साल में सब्सिडि वाले सिर्फ 6 सिलिन्डर देने का प्रावधान कर दिया था। और इनके भेदभाव की राजनीति के बारे में भी यहीं से खुलासा होता है कि उक्त 19 सितंबर 2012 को इन्होंने सिर्फ कांग्रेस शासित राज्यों में सबसिडी वाले सिलिन्डर की संख्या को 6 से बढ़ा कर 9 किया था। यहाँ ये बताना भी बहुत जरूरी है कि साल में 6 सिलेन्डर की नीति भी कांग्रेस ने ही लागू की थी। जब कांग्रेस की इस नीति का बहुत विरोध या किया गया तो फिर 17 जनवरी 2013 को पूरे देश पर एहसान करते हुये सब्सिडी वाले 9 सिलेन्डर देने का प्रावधान किया गया।(लिंक नं॰ 2) 
इस निर्णय में राहुल गाँधी को दयावान की भूमिका में प्रस्तुत किया गया था ये शायद कुछ लोगों को याद भी हो। यदि आपको ये याद न हो तो आप नीचे की तस्वीर में लिंक नं॰ 4 देख सकते हैं। 

LPG History 2

भाजपा की वर्तमान सरकार का ने 27 अगस्त 2014 को निर्णय लेते हुये साल में सब्सिडी वाले सिलिन्डर की संख्या 12 कर दी जो आज तक चल रही है। इसे आप लिंक नं॰ 3 और 4 से समझ सकते हैं। अब बात करते हैं LPG गैस की तत्कालीन और वर्तमान कीमतों की जिसे जानना आपके लिए वाकई आँख खोलने जैसा ही होगा। 2 जनवरी 2014 को बिना सब्सिडी वाले LPG गैस सिलेन्डर की कीमत थी 1241 रुपये यह जानने के लिए यहाँ क्लिक करें जो कि 1 जून 2018 को  698.50 रुपये मात्र रह गई है यह जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। ये दोनों कीमतें दिल्ली की हैं। **याद है 700-800 रुपये तो आपको तब खर्च करने पड़ते थे जब पूरे दिन लाईन में खड़े रहने पर भी गैस नहीं मिलती थी और मजबूरी में आपको काला-बाजारी से गैस लेनी पड़ती थी। अब बात करें सब्सिडी वाले LPG गैस की तो 2 जनवरी 2014 को लगभग 414 रुपये थी इस बात को जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। जो कि अब 1 जून 2018 को 493 रुपये है इसे जानने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं। ये दोनों कीमतें दिल्ली की हैं। जबकि विपक्ष द्वारा प्रचारित करते समय बिना सबसिडी वाले सिलिन्डर की कीमत 700 रुपये बताई जाती है। ये सही है कि चार सालों में LPG गॅस सिलेन्डर की कीमतों में 80 रुपये कि बढ़ोत्तरी हुई है, अर्थात लगभग 5% मात्र की वार्षिक वृद्धि।

अब ये तय करना आपके खुद के हाथों में है कि आप अपनी यादाश्त पर भरोसा करना चाहेंगे या फिर उनके ऊपर जो आपके कमजोर यादाश्त का फायदा  उठाने की कोशिश में लगे रहते हैं।

यूँ तो आप स्वयं भी चेक कर सकते हैं फिर भी आपकी सुविधा हेतु सारे लिंक नीचे दिये गए हैं:
*  लिंक नं॰ 1
*  लिंक नं॰ 2
*  लिंक नं॰ 3
*  लिंक नं॰ 4  



बेहतर इलाज़ की तलाश या बहाने से विदेश प्रवास

राहुल गाँधी जब से twitter पर सक्रिय हुए हैं, भारतीय twitter यूजर की तो मानों मौज आ गई है। ऐसा लगता है भारतीय twitter समुदाय की एक बड़ी आबादी को एक पसंदीदा शिकार मिल गया है। अभी राहुल विदेश प्रवास पर हैं जाने से पहले उन्होने एक ट्वीट किया जिसमें अपने विदेश दौरे का कारण बताते हुए भाजपा के सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के ऊपर भी अपने ही अंदाज़ में जमकर चुटकी ली। और उसके बाद तो बस वही हुआ जिसकी कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष को उम्मीद नहीं थी। पहले देखिये क्या लिखा था राहुल गाँधी ने अपने ट्वीट में।

Rahul Gandhi Tweet

राहुल गाँधी ने लिखा,
"कुछ दिनों के लिए भारत से बाहर रहूँगा। सोनिया जी के साथ उनके सालाना मेडिकल चेक अप के लिए। 
BJP के सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के मेरे मित्रों के लिए: ज्यादा मेहनत न करें....मैं जल्द ही लौटूँगा!"

इस ट्वीट के सक्रिय होते ही राहुल गाँधी ट्वीटर यूजर्स के निशाने पर आ गए। कुछ लोगों ने इनका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया तो कुछ लोगों ने उनपर ज़बरदस्त सवालों के गोले दागे।

Reply To Rahul Gandhi's Tweet

वंदना अग्रवाल नामक एक यूजर ने मज़ाक उड़ाते हुए लिखा "ऐसी कौन सी बीमारी हुई है सोनिया माता को जिसका इलाज भारत में नहीं है?पैसे कम पड़े तो बताना...नोटबंदी वाले 4 हजार अभी बचे हैं क्या?"

Reply To Rahul Gandhi's Tweet 2

एक अन्य यूजर सूर्य प्रभा ने चुटकी लेते हुए दोनों "माँ-बेटे को गर्मी की छुट्टियों की शुभकामना" दे दी। 

Reply To Rahul Gandhi's Tweet 3

वहीं राहुल व्यास ने लिखा "सही है, इतने सालों तक लगातार कांग्रेसी शासन के बावजूद आधारभूत संरचनाएं इतनी घटिया हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष को भी उस पर यकीन नहीं। बहरहाल, BJP की निरंतर जीत के लिए हम चाहते हैं कि आप जल्दी लौटें।"

Reply To Rahul Gandhi's Tweet 5


आकाश जैन नामक यूजर ने तो बकायदा गौरीगंज, अमेठी के राजकीय होमियोपैथिक चिकित्सालय की तस्वीर संलग्न करते हुए लिखा "भाई कल......अगर कोई ज्यादा प्रोब्लेम होगी वहाँ तो टेंशन मत लेना......यहाँ आपके गाँव में इस हॉस्पिटल में मुफ्त में इलाज़ हो जायेगा।"

Reply To Rahul Gandhi's Tweet 6


आनन्द कुमार सिंह नामक यूजर का आक्रोश उनके सवालिया ट्वीट से जाहिर होता है - "70 सालों में world level का अस्पताल तक नहीं बनवा सके #भ्रष्टाचारी ~ @INCIndia और #Pidi पूछते हैं #मोदी_सरकार_के_4साल में क्या हुआ?"

बहरहाल, अब तक इस ट्वीट पर 12000 से भी अधिक लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। कुछ लोगों ने जब राहुल के समर्थन में कुछ लिखा तो फिर वो भी लोगों के निशाने पर आ गए और लोगों ने उन्हें भी ट्रोल करना शुरू कर दिया। वैसे, ये उम्मीद तो नहीं है कि राहुल लोगों के सवालों के जवाब देंगे। फिर भी, कुछ सवाल तो लाजिमी ही हैं जैसे-
1. आखिर सोनिया गाँधी की बीमारी क्या है और वो इसका इलाज़ कराने कहाँ जाती है?
2. आखिर सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी की विदेश यात्राएं हमेशा गुप्त क्यों होती हैं?
3. आखिर भारत सरकार से मिली सुरक्षा को छोड़ कर बाहर जाने का इनका प्रयोजन क्या होता है?
4. आखिर भारत में इतने सालों तक राज करनेवाली कांग्रेस के बनाए अस्पतालों पर इनका भरोसा क्यों नहीं है? 5. आखिर हर बार विदेश यात्राओं के लिए सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी को बहाने बनाने की क्या जरूरत है? 




सभी तस्वीर : twitter screenshot 

तुम कौन हो भाई : भक्त या चाटुकार

तुम कौन हो भाई ? "भक्त" या "चाटुकार" ?  सुनने में ये अजीब लग सकता है लेकिन, आज भारत की अधिकांश आबादी अब सिर्फ इसी दो जाति या धर्म में सिमट कर रह गई है। यकीन नहीं होता तो एक सरसरी निगाह सोशल मीडिया पर हो रही तक़रीरों पर दे डालिए। सोशल मीडिया के वर्चुअल वर्ल्ड में आप किस जाति या धर्म से ताल्लुक रखते हैं ये आपके नाम या उसके साथ जुड़े सरनेम से तय नहीं होता। बल्कि ये तय हो रहा है आपकी राजनैतिक विचारधारा से। भाजपा समर्थकों को विरोधी दलों के लोगों ने "भक्त" कहना शुरू कर दिया प्रत्युत्तर में भाजपा समर्थकों ने विरोधियों को "चाटुकार" की संज्ञा दे डाली। और ये सिलसिला लगातार चल ही रहा है। 

Social Media In Indian Politics


अब पूरी सोशल मीडिया में कोई भी शर्मा जी, सिंह साहब,यादव जी, खान साहब या मि॰ डेविड नहीं रहे। ये सब के सब या तो भक्त हैं या फिर चाटुकार। मीडिया का भी ऐसा ही धर्मांतरण हो चुका है, भक्त मीडिया या चाटुकार मीडिया। हालात ऐसे हो चुके हैं कि कई बार विचारधारा के आधार पर लोगों की वास्तविक जाति या धर्म तक को मानने से इन्कार कर, उन्हें फ़ेक आई डी वाला भी घोषित कर दिया जाता है। इन सारे हालातों की वजह पिछले लोकसभा चुनाव 2014 को माना जाता है। जिसके बारे में कुछ लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि भारत में 2014 का लोकसभा चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि ये पहला चुनाव था जो पूरी तरह से Facebook पर लड़ा गया था। 

Social Media

2014 में हुए उस चुनाव के समय से ही राजनीति में सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक बड़े पैमाने पर होना शुरू हो गया था जो अब संभवतः अपने चरम स्थिति पर है। पिछला लोकसभा का चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ने का फैसला किया था। जैसा कि सभी जानते हैं उस चुनाव की प्रारम्भिक तैयारियों से ले कर पूरे चुनावी प्रक्रिया के सम्पन्न होने तक भाजपा ने सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया। सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर विभिन्न डिजिटल पी॰ आर॰ एजेंसियों की मदद से शानदार कैम्पेन चलाया गया। इस कैम्पेन का ज़बरदस्त फायदा नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा को हुआ। सोशल मीडिया की वजह से बहुत बड़ी तादाद में नरेंद्र मोदी के नए समर्थक बने और उनका जुड़ाव भाजपा से हुआ। इसकी देखा-देखी बाद में लगभग सभी राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरू कर दिया और उनके समर्थकों के अलग-अलग समूह सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हो चुके हैं। 

Social Media Politics


सोशल मीडिया को यदि आधुनिक युग का अड्डा या चौपाल कहें तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। वैसे भी बदलते हुए आधुनिक परिवेश में वो पुराने अड्डे या चौपाल बचे ही कहाँ हैं। पहले इन अड्डों चौपालों पर लोग एक कप चाय की चुसकियाँ लेते-लेते जमाने भर की सामाजिक, राजनीतिक, खेल अथवा सिनेमा की चर्चाएँ कर लिया करते थे। अब वो सारी चर्चाएँ घर बैठे, ट्रेन या बस में सफर करते हुए या फिर ऑफिस/दफ्तर में काम करते हुए ही हो जाया करती हैं। Facebook, WhatsApp, Twitter, You Tube या Google+ जैसे अनगिनत प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं। अखबारों, पत्रिकाओं से लेकर टीवी समाचारों तक कि व्याख्या बड़ी ही सहजता और सुगमता के साथ सोशल मीडिया पर ही हो जाती है। बहरहाल, जिस तरह से भारत के सारे जाति और धर्म के लोग अब सिर्फ "भक्त" या "चाटुकार" की श्रेणी में बंटते जा रहे हैं यह हैरान करने वाला है और एक नए विमर्श की शुरुआत करने वाला भी।






सभी तस्वीरें : Google से साभार 

कैसे रहें सुरक्षित निपाह के बढ़ते कहर से

केरल में अब तक एक दर्जन से अधिक लोगों की जान ले चुके "निपाह वायरस" का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा। केरल के साथ-साथ अब ये पूरे भारत के लिए एक खतरा बनता जा रहा है। सरकार और अन्य स्वास्थ्य सेवी संस्थाओं के लिए भी ये गहन चिंता का विषय बन चुका है। ऐसा माना जा रहा है की चमगादड़ों की एक विशेष प्रजाति के द्वारा ये वायरस फैल रहा है। 

Nipah Virus  

इस वायरस के संक्रमण का एक कारण सूअरों को भी माना जा रहा है। स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों के अनुसार निपाह वायरस से बचने के लिए सूअर के माँस के अलावा उन फलों के सेवन से भी बचना चाहिए जिसे चमगादड़ों द्वारा जूठा किए जाने की आशंका हो। मुख्य तौर पर केला, आम, अंगूर और खजूर से बचने की बात कही जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के दावे के अनुसार "निपाह वायरस" चमगादड़ों की एक विशेष प्रजाति "ग्रेटर इंडियन फ्रूट बैट" के मल, मूत्र और लार से फैलता है। 

Fruit Stall

जिस तेजी से इस बीमारी और इसके कारणों की खबर फैलती जा रही है, लोगों में भय और आशंका भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। इसी भय और आशंका के कारण सरकार ने भी लोगों को इन फलों से परहेज करने को कहा है। लेकिन, इसका बहुत बड़ा खामियाजा फलों के स्थानीय बिक्री एवं निर्यात पर बड़ा ही प्रतिकूल असर पड़ा है। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार कई देशों ने दक्षिण भारत से निर्यात होने वाले फलों की खरीद पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। 



तस्वीर सौजन्य : Google

बुलंद हौसलों की दास्तान 6 लेन सह 14 लेन एक्सप्रेस वे का निर्माण

बुलंद हौसलों और अटल इरादों की दास्तान सुनाने को तैयार हो चुका है, 135 किलोमीटर लंबा, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे जो नई दिल्ली से मेरठ तक के रास्ते को न केवल आसान बना देगा, बल्कि दिल्ली और एन सी आर में लगने वाले जाम तथा प्रदूषण की भीषण समस्या से भी निजात दिलाने में कारगर साबित होगा. यह एक्सप्रेस वे नई दिल्ली से डासना (गाज़ियाबाद) तक 14 लेन और शेष 6 लेन का बना है. 

Eastern Peripheral Expressway

मात्र 17 महीने में बने इस एक्सप्रेस वे की खासियत यह है कि इसपर चलते हुए आप न सिर्फ सुविधाजनक तरीके से दूरी तय करेंगे, बल्कि सफ़र का आनंद भी उठा पाएंगे. आपके सफ़र को और सुहावना और आनंददायक बनाने के लिए पूरे  रास्ते हरियाली और पानी के फव्वारों की विशेष व्यवस्था की  गयी है. 135 किलोमीटर के इस सफर को और भी आकर्षक बनाने के लिए पूरे भारत के कुल 36 स्मारकों के लघु प्रतीक बनाये गए हैं  जो आपको सम्पूर्ण भारत दर्शन का अहसास दिलाएगा. 

Miniature Monuments Besides Eastern Peripheral Expressway

इस एक्सप्रेस वे  शिलान्यास नवम्बर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. इस एक्सप्रेस वे के बारे में ये जानना अहम्  है कि इसे तय समय से पहले तैयार कर लिया गया है जो यह साबित करता है कि अगर इरादे नेक हों तथा हौसले बुलंद तो फिर कुछ भी मुमकिन है. इस शानदार एक्सप्रेस वे का निर्माण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दावे की भी पुष्टि करता है जिसमें उनहोंने कुछ दिन पहले ही कहा था कि जिस किसी भी योजना का वो शिलान्यास करते हैं उसका उद्घाटन भी वही करते हैं.  उनकी योजनाओं की घोषणा चुनावी लाभ के उद्देश्य से नहीं की जाती. 

जब भी मौका मिले इस शानदार ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस वे से गुजरने का यक़ीन करें इसकी तारीफ किये बिना नहीं रह पाएंगे और शायद ज़िंदगी एक सफर है सुहाना  गाने को गुनगुनाने को बाध्य हो जायेंगे.