काँग्रेस का हाथ लश्कर के साथ

जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गठबंधन टूटने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. और राष्ट्रपति शासन के लगते ही सेना ने आतंकवादियों से निपटने की अपनी तैयारियों को पुख्ता करते हुए एक्शन में आ गयी.  सेना की गतिविधियों के शुरू होते ही आतंकियों और अलगाववादियों में हड़कंप मचना स्वाभाविक था, जो शुरू हो गया. पर जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है वो है देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी का दहशत में आना या फिर दहशतगर्दों का समर्थन करना. हाल ही में काँग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने सेना के ऊपर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में चार आतंकी के साथ 20 निर्दोष लोगों को मारा जा रहा है. इसके तुरंत बाद लश्कर की ओर से आतंकी महमूद शाह ने बयान देते हुए राष्ट्रपति शासन की न सिर्फ निंदा की बल्कि लिखित बयान जारी कर बाकायदा गुलाम नबी आज़ाद का नाम लेते हुए समर्थन किया और कहा कि जम्मू और कश्मीर के मामले में उनका भी स्टैंड वही है जो काँग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद तथा अन्य काँग्रेस नेताओं का है. 


यूँ तो गुलाम नबी के इस बयान और उसके बाद आये लश्कर के समर्थन को लेकर भाजपा के सभी नेताओं ने अपना आक्रोश जाहिर किया है. लेकिन, जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि देश की बाँकी विपक्षी पार्टियों ने  इस मामले में एक मतलबी चुप्पी साध राखी है. तो, क्या अब ये मान लिया जाए कि राजनीति और सत्ता पाने के लिए देश के विपक्ष को देशद्रोहियों से हाथ मिलाने और उनकी भाषा बोलने में भी कोई शर्म या गुरेज नहीं है? किसी को भी बुरा नहीं लग रहा कि गुलाम नबी के एक बयान ने देश के दुश्मनों को कितनी ताक़त दी है?  बहरहाल,भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने इस बयान की बाबत क्या कहा आप भी देखें.


वैसे बताते चलें कि आतंकियों पर नकेल कसने के लिए दो विशेष अधिकारी बी वी आर सुब्रमण्यम और विजय कुमार को जम्मू-कश्मीर बुलाया गया है. सुब्रमण्यम कि गणना देश के एक ऐसे योग्य अधिकारी के रूप में होती है जिन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शान्ति स्थापित करने का खासा अनुभव है और विजय कुमार के नेतृत्व वाली टीम ने ही दक्षिण के मशहूर और कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन का अंत किया था. सुब्रमण्यम को जम्मू कश्मीर राज्यपाल का  मुख्य सचिव तथा विजय कुमार को राज्यपाल का मुख्य सलाहकार बनाया गया है.

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इन विशेष अधिकारियों, सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान और प्रयास घाटी में कितने कारगर होंगे तथा जम्मू-कश्मीर की समस्या का समाधान किस हद तक संभव हो सकेगा ये अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन, देश के सामने देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी काँग्रेस का जो वीभत्स चेहरा उजागर हुआ है वो वाकई चिंता में डालने वाली है. और इससे भी ज्यादा चिंता में डालनेवाली है उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की खामोशी जो कभी मोमबत्ती तो कभी तख्ती लेकर देश और दुनिया को ये बताने के लिए आतुर रहते हैं कि हमारे यहाँ कितनी असहिष्णुता बढ़ रही है?


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आखिर क्यों जरूरी हुआ कश्मीर में सत्ता से संधि-विच्छेद

जम्मू कश्मीर में सरकार से भाजपा के समर्थन वापस लेते ही केंद्रीय सुरक्षा बल पूरी तरह से सक्रिय हो गया और ऑपरेशन ऑल आउट के तहत 180 आतंकियों की हिट-लिस्ट तैयार कर उस पर एक्शन शुरू कर दिया. तो क्या यही वज़ह थी भाजपा द्वारा सरकार से समर्थन वापसी की जिसे सरकार में रहते हुए अंजाम नहीं दिया जा सकता था? क्योंकि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का अलगाववादियों के प्रति नरम या फिर सहयोगी रवैया इसमें आड़े आ रहा था. या कुछ और भी था जो भाजपा को अन्दर ही अन्दर परेशान कर रही थी.

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कठुआ मामले में जम्मू के डोगरा हिन्दुओं के विरुद्ध एकतरफा कार्रवाई और उनका निरंतर अपमान और प्रताड़ना के फलस्वरूप हिन्दुओं में उपजा आक्रोश.

जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड में 400 से अधिक मुसलमानों की बहाली का मामला.

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आईएसआईएस की हिमायती "जमियत अहले हदीस" को श्रीनगर में ईदगाह बनाने हेतु तकरीबन साढ़े छः एकड़ जमीन देने का निर्णय.

200 करोड़ की लागत से इस्लामिक विश्वविद्यालय बनाने की योजना.

अलगाववादियों और विद्रोहियों के पक्ष में एकतरफा सीजफायर के लिए दवाब डालना.

अब इतने विरोधाभासों के साथ-साथ देश और हिंदु हितों की अनदेखी भाजपा कैसे बर्दाश्त कर सकती थी. सो, हो गया सत्ता से संधि-विच्छेद.

अब, जबकि भाजपा ने जम्मू और कश्मीर की सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है, भाजपा की और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वो सुनिश्चित कर सके कि समय रहते जम्मू और कश्मीर में शान्ति कायम करने और धार्मिक भेदभाव समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये जाएँ.

यूँ तो, शुरूआती दौर में ऐसा लग रहा है कि सेना को दवाबमुक्त होकर काम करने के निर्देश दिए जा चुके हैं. लेकिन अन्य सभी मामलों में भाजपा को कड़ी अग्निपरीक्षा का सामना करना होगा जो कि काफी चुनौतीपूर्ण भी है.







क्या भाजपा ने अपने गले की हड्डी निकालकर विरोधियों के गले में डाल दी है

कश्मीर में राजनीती ने एक बार फिर से नयी करवट ली है और तीन सालों से चली आ रही पीडीपी और भाजपा गठबंधन की सरकार गिर गयी. राजनीति के लिए गठबंधन सरकारों का बनना और गिरना कोई नयी या बड़ी बात नहीं है. लेकिन, कश्मीर में बनी गठबंधन की सरकार और आज उस गठबंधन के टूट जाने की घटना को एक सामान्य राजनैतिक घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता. कश्मीर में भाजपा का पीडीपी को समर्थन देकर सरकार बनाना भी एक बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम था. किन्तु, तीन सालों के बाद भाजपा द्वारा पीडीपी से समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरा देना उससे भी बड़े महत्त्व की घटना है.

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भाजपा के इस निर्णय की अनेकों व्याख्याएं की जायेंगी और अनेकानेक राय व्यक्त किये जायेंगे. लेकिन, ये तय है कि अपने इस कदम से भाजपा ने एक साथ कई निशाने साधने की चाल चल दी है और विरोधियों को अनायास ही बिलकुल हक्का-बक्का कर दिया है. बेशक, विरोधी कुछ भी बोलें लेकिन भाजपा के इस कदम से उनकी आधी जुबान उनके हलक में अटक सी गयी है. अगर यही परिस्थिति किसी अन्य राज्य में होती तो अब तक दूसरी पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने की कवायद शुरू हो गयी होती. पर, यहाँ सभी ने अपने हाथ-पैर पीछे खींच लिए हैं और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है. भाजपा न सिर्फ ये सन्देश देने में सफल हुयी है कि वो सत्ता के लिए देश कि अस्मिता और सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकती बल्कि हिन्दू हितों के लिए भी अपनी प्रतिबद्धता साबित करने में सफल हुई है. कैसे पढ़ें अगले पोस्ट में. यहाँ क्लिक करें.

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ऐसा करके भाजपा ने न सिर्फ अपने गले में फंसी हड्डी निकाल फेंकी है बल्कि वही हड्डी उसने विरोधियों के गले में डाल दी है जो उनके लिए न तो निगलते बन रहा है न उगलते. अब एक तरफ वो सत्ता की लोभी कहलाने से बच गयी तो दूसरी तरफ अब अपने सारे एजेंडे को संवैधानिक तरीके से बिना किसी राजनैतिक दबाव के पूरा करवा सकती है. विरोधी नेशनल कांफ्रेंस नेता अब्दुल्ला ने तो सरकार गिरने के तुरंत बाद ही दुबारा चुनाव कराये जाने की मांग कर दी, लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं होने देगी. अब कश्मीर एक बार पुनः राष्ट्रपति शासित प्रदेश होगा, जो वहां के अलगाववादियों और हिंदु विरोधी ताक़तों के लिए गंभीर चिंता और दहशत का कारण हो सकता है. जम्मू और कश्मीर में लगा ये राष्ट्रपति शासन पूर्व के सभी राष्ट्रपति शासनों से भिन्न है और इसके मायने भी बिलकुल ही अलग हैं.  


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क्या कहा एच॰ डी॰ कुमारस्वामी ने प्रधानमंत्री के फ़िटनेस चैलेंज पर

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का वो ट्वीट जिसमें उन्होंने क्रिकेटर विराट कोहली के फ़िटनेस चैलेंज को स्वीकार करते हुये अपने प्रातःकालीन व्यायाम और योगाभ्यास के वीडियो को शेयर किया वो सोशल मीडिया पर खासा लोकप्रिय हो चुका है। अब तक लाखों लोग उस वीडियो को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लैटफ़ार्म पर देख और पसंद कर चुके है। इस वीडियो को सोशल मीडिया पर जारी करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम आईपीएस अधिकारियों के साथ-साथ कर्नाटक के नव-नियुक्त मुख्यमंत्री एच॰ डी॰ कुमारस्वामी को भी इसके लिए चैलेंज कर दिया। 

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प्रधानमंत्री मोदी की ओर से ये फ़िटनेस चैलेंज मिलने के थोड़ी देर बाद ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी ने अपनी प्रतिक्रिया ट्वीटर पर पोस्ट किया। यूँ तो उन्होंने प्रधानमंत्री के चैलेंज को स्वीकार तो नहीं किया पर उन्होंने प्रधानमंत्री को अपने जवाब में लिखा कि :  
"मैं सम्मानित हुआ, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरे स्वास्थ्य का ख्याल किया। मैं भी शारीरिक फ़िटनेस के महत्व में यकीन करता हूँ। और आपके उद्देश्य का समर्थन भी करता हूँ। योग और ट्रेडमिल का अभ्यास मेरी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा हैं। 
वैसे, मैं अभी अपने राज्य के विकास और फ़िटनेस के लिए ज्यादा चिंतित हूँ और इसके लिए आपके सहयोग की उम्मीद करता हूँ।"
मतलब, अवसर मिलते ही राजनीति करने का मौका नहीं चूके  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी। 

क्या खास है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के फ़िटनेस वीडियो में


पिछले दिनों खेल जगत से आए हुये खेल एवं सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने फ़िटनेस चैलेंज नामक एक परंपरा शुरू की थी। इसके बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों ने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये दूसरों को भी चैलेंज करना शुरू किया। इसी क्रम में कुछ दिन पहले क्रिकेटर विराट कोहली ने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने विराट के चैलेंज को स्वीकार किया था और आज उन्होंने अपना फ़िटनेस वीडियो शेयर करते हुये इस चैलेंज को पूरा किया।

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इस फ़िटनेस वीडियो को शेयर करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया और लिखा "ये मेरे प्रातःकालीन व्यायाम के क्षण हैं। योग के अलावा मैं एक ऐसे स्वनिर्मित पथ पर पैदल भी चलता हूँ जिसकी प्रेरणा जीवन के पंचतत्व हैं - भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश।  यह अत्यंत ही ताज़गीदायक और कायाकल्प करने वाला है। मैं श्वसन के अभ्यास भी करता हूँ।" 


अपने इस पोस्ट को शेयर करने के बाद उन्होंने देश के सभी आईपीएस अधिकारियों के अलावा कर्नाटक के नव-नियुक्त मुख्यमंत्री  एच॰ डी॰ कुमारस्वामी और 2018 कॉमनवैल्थ गेम की सर्वाधिक स्वर्ण विजेता मनिका बत्रा को भी इस फ़िटनेस चैलेंज को स्वीकार करने का न्यौता दिया। 
यूँ तो 67 वर्षीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की इस पहल का सबों ने स्वागत किया है और इसे प्रेरणादायक बताया है लेकिन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच॰ डी॰ कुमारस्वामी, प्रधानमंत्री श्री मोदी को धन्यवाद देते हुए इस पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आए।


आखिर क्यों राजनीति के विदूषक बनते जा रहे हैं राहुल गाँधी

बचपन के दिनों में गणित विषय के एक प्रश्न ने न जाने कितने ही छात्रों  के दिमाग को चकरघिन्नी की तरह घुमाया होगा। और वो प्रश्न था : 
एक बंदर बिजली के एक चिकने खंबे पर एक मिनट में 4 फिट ऊपर चढ़ता है और दूसरे मिनट में 3.5 फिट नीचे फिसल जाता है, अगर खंबे की ऊँचाई 42 फिट है तो बंदर को खंबे पर चढ़ने में कितना समय लगेगा ?  
वार्तमान समय में यह प्रश्न राहुल गांधी के संदर्भ में पूछा जा सकता है। आखिर राहुल गाँधी नेता कब बन पाएंगे? क्योंकि जहाँ कांग्रेस उन्हें नेता बनाने के लिए ज़ोर लगा रही है वे जोकर (विदूषक) बनते जा रहे है। पिछले कई सालों से राहुल गाँधी को नेता बनाने में कांग्रेस ने करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, ये बात सर्वविदित है। कई पी॰ आर॰ एजेंसियों ने राहुल गाँधी की इमेज ग्रूमिंग का जिम्मा लिया हुआ है। खुद कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी राहुल के कैरियर सँवारने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हुआ है। लेकिन इन सबों के बावजूद राहुल गाँधी ने मानों सबों को गलत और फ़ेल साबित करने का ठान लिया है। 
इतने सारे सामूहिक प्रयासों के बावजूद वो नेता बन पाये या नहीं ये तो वक़्त बताएगा लेकिन, राजनीति के विदूषक के रूप में वो ख़ासी ख्याति पाते जा रहे हैं। 


अभी हाल ही में उनके भाषण  का एक वीडियो सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमे वो बता रहे हैं कि, कोका कोला कंपनी का मालिक पहले अमरीका में शिकंजी बेचता था, मैक-डोनाल्ड कंपनी का मालिक पहले ढाबा चलाता था, तथा फोर्ड और मर्सिडीज कंपनियों के मालिक भी पहले मैकेनिक थे। 
राहुल गाँधी वहाँ उपस्थित लोगों को बताना छह रहे हैं कि ये सारे लोग सफल हो गए क्योंकि अमरीका कि सरकारों ने इन लोगों कि प्रतिभा का सम्मान करते हुये उन्हें हरसंभव मदद की। और भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार में ऐसा संभव नहीं हो रहा क्योंकि नरेंद्र मोदी योग्य और प्रतिभाशाली लोगों की मदद नहीं करना चाहते बल्कि ये तो उन्हें पीछे धकेलने में यकीन करते हैं। 



इस वीडियो के वायरल होते ही राहुल का मज़ाक उड़ाने की तो मानो होड़ सी लग गई सोशल मीडिया में। देश ही नहीं विदेशों में भी हर कोई अपने-अपने तरीके से इस भाषण पर मज़े लेता हुआ दिखा। लेकिन, इस मज़े लेने की होड़ में शायद लोगों ने उन गंभीर आरोपों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया जो राहुल गाँधी ने वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए। वैसे तो राहुल की बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता किन्तु इस वीडियो को ध्यान से देखने-सुनने के बाद एक बात तो निश्चित रूप से साबित हो जाती है कि या तो राहुल पूरे देश को मूर्ख समझते हैं या फिर वे स्वयं महामूर्ख हैं। 

शाबास कल्पना हमें तुम पर नाज़ है

ऊँची उड़ान के लिए बड़े पंखों की नहीं बल्कि परवाज़ के बड़े हौसले की जरूरत होती है. और इसे साबित कर दिखाया है बिहार के अत्यंत ही छोटे और संभवत: सबसे नये जिले शिवहर की कल्पना ने. मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए आयोजित राष्ट्रीय योग्यता सह प्रवेश परीक्षा NEET-2018 में संपूर्ण भारत में प्रथम स्थान प्राप्त कर कल्पना ने न सिर्फ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया बल्कि ये साबित कर दिखाया कि प्रतिभा कभी भी किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं होती। 

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शिवहर जिले के तरियानी प्रखण्ड निवासी श्री राकेश मिश्रा की सुपुत्री कल्पना नवोदय विद्यालय, शिवहर की छात्रा रही हैं। कल्पना के पिता श्री राकेश मिश्रा, राजकीय बुनियादी विद्यालय में शिक्षक रह चुके हैं और फिलहाल डायट में कार्यरत हैं। कुल 720 अंकों वाली NEET परीक्षा में कल्पना ने 691 अंक प्राप्त किए और ये कीर्तिमान कायम कर दिया। NEET-2018 के परिणाम घोषित होने के दो दिनों बाद ही बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के 12वीं के परिणाम भी घोषित हुये और इसमें भी कल्पना ने 86.6% अंक प्राप्त कर पूरे प्रदेश में अव्वल स्थान प्राप्त किया। 
आज बिहार ही नहीं पूरे देश को इस बेटी की शानदार उपलब्धि पर नाज़ है। सारा देश इसकी प्रतिभा को सलाम कर रहा है। आइये हम और आप भी इस होनहार बेटी कल्पना पर नाज़ करें, उसे सलाम करें।  

क्या फेल हो जाएगा काँग्रेस का पेट्रोल बम

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के चार साल पूरे हो चुके और बस एक साल रह गए हैं अगले आम चुनाव में। देश कुल मिलाकर दो तबकों में बँट चुका है। एक तबका भाजपा सरकार के कामकाज से संतुष्ट नज़र आ रहा है तो दूसरे तबके की परेशानियाँ और शिकायतें थमने का नाम नहीं ले रहीं। इन दोनों तबकों की संतुष्टि और परेशानी की अनेक वजहें हैं। लेकिन, इन दोनों ही तबकों के बीच एक खास वजह है जो एक तबके के लिए जहाँ संतुष्टि का कारण है वहीं दूसरे तबके के लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब भी वही है। और वो वजह है पिछले चार सालों में एक भी भ्रष्टाचार या घोटाले का जाहिर या साबित न होना। अब चुनाव सामने है, समय कम है, विरोध भी करना है। तो, विरोध के लिए मुद्दा भी चाहिए। और अभी वो बड़ा मुद्दा बन गया है पेट्रोल की बढ़ती कीमत। 

Petrol Prices In Major Cities

इसमें कोई संशय नहीं कि बढ़ती हुई पेट्रोल की कीमतें आम जनों के लिए वाकई चिंता और परेशानी का कारण हैं। और सरकार को इसके स्थायी समाधान का रास्ता निकालने की व्यवस्था करनी भी चाहिए। लेकिन, बढ़े हुये पेट्रोल और डीजल की कीमतों के परिप्रेक्ष्य में अगर पिछली सरकार के प्रदर्शन पर गौर करें तो पता चलता है कि वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार की तुलना में पेट्रोल डीजल की कीमतों को न सिर्फ ज्यादा बेहतर और संतुलित तरीके से नियंत्रित किया है बल्कि अभी भी कीमतें पिछली काँग्रेस सरकार के अधिकतम स्तर से कम ही है। अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के ताज़ा ऑनलाइन अंक में प्रकाशित लेख तो ऐसा ही बताता है। इंडियन एक्सप्रेस की उक्त लेख को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।  

Petrol Pump

इंडियन एक्सप्रेस की उपरोक्त खबर बताती है कि पिछले रविवार को पेट्रोल की कीमतों में 10 पैसे कि वृद्धि होने के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत पिछले चार-पाँच साल के सर्वाधिक स्तर पर पहुँचकर 74.40रु/ली॰ हो गई। वैसे सितंबर 2013 में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 76.06रु/ली॰ थी। कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में भी पिछले सोमवार से ही पेट्रोल की कीमतें अपने पिछले चार साल के अधिकतम क्रमशः 77.20, 82.35 और 77.29रु/ली॰ तक पहुँच गई। वैसे कोलकाता में पेट्रोल की कीमतों का अधिकतम स्तर 78.03रु/ली॰ (अगस्त 2014) में था जबकि, मुंबई का अधिकतम 83.62रु/ली॰ (सितंबर 2013) तथा चेन्नई में सर्वाधिक 77.48रु/ली॰ (सितंबर 2013) में रह चुका है। उपरोक्त सभी आंकड़ों की सत्यता जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

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जैसा कि ऊपर देख सकते हैं, अभी कुछ दिनों पहले क्रिकेटर विराट कोहली के फ़िटनेस चैलेंज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वीकार किए जाने पर काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर चुटकी लेते हुये उन्हें फ्युल चैलेंज को स्वीकार करने की चुनौती देते हुये कहा कि :
तेलों के दाम कम करें अन्यथा कांग्रेस राष्ट्रव्यापी आंदोलन कर के आपको ऐसा करने को बाध्य करेगी।  
उक्त ट्वीट करने से पहले राहुल गाँधी ने होमवर्क किया था या नहीं या फिर हमेशा की तरह यूँ ही बोल गए ये तो पता नहीं, किन्तु जहां तक पेट्रोल का अर्थशास्त्र है, कम से कम भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से बुरा तो नहीं ही है। वैसे राहुल गाँधी को ट्विटर पर तो लोगों ने जवाब दिया ही साथ ही भाजपा आईटी सेल ने भी कुछ इस तरह जवाब दिया।

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यूँ तो ये तस्वीर बयान करती है कि काँग्रेस शासन की अपेक्षा भाजपा शासन में पेट्रोल की कीमतों में ज्यादा का उछाल नहीं आया है बल्कि कीमतें संतुलित भी रही हैं। फिर भी इस तस्वीर में बताए गए आंकड़ों की सत्यता के लिए इंडियन ऑयल की वैबसाइट को देखने से ये पता चलता है कि उक्त आंकड़े बिलकुल सही हैं। पेट्रोल की कीमत संबन्धित आंकड़ो को ऑनलाइन देखने के लिए यहाँ क्लिक करें। इन हालातों में अगर देखा जाये तो मोदी सरकार के पास वैसे भी अभी पूरा एक साल बचा है जिसमें वो कभी भी पेट्रोल/डीजल की कीमतों के परिप्रेक्ष्य में कोई बड़ा महत्वपूर्ण फैसला लेकर जनता को खुश कर सकती है। लेकिन तत्काल तो काँग्रेस का मोदी सरकार के विरुद्ध छोड़ा गया ये पेट्रोल बम फेल होता ही दिखता है। 

2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है

"मुस्लिम तुष्टीकरण" भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाये तो आज़ादी के समय से ही ऐसा होता आ रहा है, और भारत की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से अपने हानि-लाभ का ध्यान रखते हुये ऐसा करती आ रही हैं। हालाँकि ये बात दीगर है कि इतने सालों से राजनीति पोषित होने के बावजूद भी भारत के सामान्य मुसलमानों के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं आ सका है। चुनावों में फायदा लेने की नीयत से धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव अथवा तुष्टीकरण को भारत में एक जमाने से "धर्मनिरपेक्षता" का नाम दिया जाता रहा है। 

Rahul Gandhi Getting Ready For Iftar Party

अभी हाल ही में हुये कर्नाटक विधान सभा के चुनाव के परिणामों के बाद भारत की सभी विपक्षी दलों को शायद ये एहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का अकेले मुक़ाबला करने की औकात किसी भी राजनैतिक दल की नहीं। तो बेशक, वो सारी पार्टियाँ जो कभी एक-दूसरे की धुर-विरोधी थी, आज एक दूसरे के साथ हाथ-में-हाथ और कंधा-से-कंधा मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मुकाबला करने का निर्णय कर लिया। इसकी शुरुआत के तौर पर पहले कर्नाटक में सीटों के गणित में भाजपा को पछाड़ने और राज्य की सत्ता पाने के लिए जेडीएस और काँग्रेस का गठजोड़ किया। फिर इसी गणित के आधार पर हाल ही में  चौदह उपचुनाव लड़े गए जिसमें भाजपा को हराने में विपक्ष सफल हुआ। इन सारी कवायदों में बहाने के तौर पर "धर्मनिरपेक्षता" ही रही है। 


Rahul Gandhi In Muslim Costume

अब इस गठबंधन को वक़्त की आवश्यकता और तर्कसंगत बताने के लिए इन राजनैतिक पार्टियों के पास एक ही हथियार बचा है और वो है "धर्मनिरपेक्षता"। इन सभी पार्टियों की राजनैतिक विवशता है कि वो आपस में विलय नहीं कर सकते, क्योंकि इन सभी पार्टियों का जन्म ही काँग्रेस के विरोध से हुआ है और सबों के राजनैतिक आधार का मूल "मुस्लिम तुष्टिकरण" ही है। अब जबकि ये सारी पार्टियाँ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी तो ये भी तय है कि ये सारी पार्टियाँ अपने-अपने राजनैतिक भविष्य के मद्देनजर इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगी कि उनका "मुस्लिम जनाधार" उनके साथ ही रहे। और चूँकि काँग्रेस सहित गठबंधन की सभी पार्टियाँ अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं तो ये निश्चित ही है कि सबों की नज़र मुस्लिम मत-दाताओं पर सबसे खास रहने वाली है। 

political iftar party


रमज़ान का महीना चल रहा है और ऐसी संभावना है कि अगले साल के रमज़ान से पहले ही चुनाव सम्पन्न भी हो जाएँ, इस लिहाज़ से इफ्तार वाली राजनीति के साथ ही अगले चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियाँ जुट गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा इन सबों से अलग रहने वाली है। भाजपा का अपना तर्क है कि उसने जो भी विकास के कम किए हैं उसमें हिन्दू या मुसलमान में कोई भेद-भाव किए बगैर किया है, साथ ही तीन तलाक जैसे मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं के वोट के माध्यम से मुस्लिम वोटों में से अपना शेयर निकालने की कोशिश भाजपा भी उतने ही ज़ोर-शोर से करने की तैयारी में है। 

तो ऐसे में हैरत नहीं होगी कि अगले चुनाव में हर तरफ से अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा का शोर सुनाई दे।  

क्या आपकी कमजोर यादाश्त ही राजनीति की खुराक है आइये जानें LPG के बहाने

देश की राजनीति आपके ऊपर कितना प्रभाव डालती है ये बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी यादाश्त कैसी है? यकीन मानें राजनीति आपकी इसी कमजोर यादाश्त की खुराक पाकर फलती-फूलती रही है। यदि भरोसा न हो तो नीचे दिये गए तथ्यों को ध्यान से देखें, पढ़ें और समझें। आज इसे समझाने के लिए हमने उस LPG गैस को माध्यम बनाया है जिसके लिए आप को कभी सारे-सारे दिन लाईन में खड़ा रहना पड़ता था। शायद आपको ये भी याद आ जाये कि कितने दिन पहले नं॰ लगाना होता था और कितने दिनों के इंतज़ार के बाद गैस मिलता था। साथ ही, और भी कई बातें जो शायद आपको याद हो न हो।  

Que For LPG Gas Cylinder

ये पोस्ट उनके लिए भी खास है जिन्हें ये यकीन दिलाने में सारा विपक्ष दिन-रात एक किए हुये है कि वर्तमान सरकार ने जनता के हित में कुछ भी नहीं किया और उनकी रसोई महँगी हो गई है। इसे समझने के लिए पहले इस लिंक पर यहाँ क्लिक करें। इस लिंक को क्लिक करते ही आपको नीचे दिये गए तस्वीर में दिखाई गई सर्च रिज़ल्ट दिखेगी। 

LPG History 1

अब ऊपर दिये गए सर्च परिणामों में सबसे पहले तीर के निशान से इंगित किए गए लिंक नं॰ 1 को देखते ही आपको पता लगेगा कि 19 सितंबर 2012 से पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एक परिवार को एक साल में सब्सिडि वाले सिर्फ 6 सिलिन्डर देने का प्रावधान कर दिया था। और इनके भेदभाव की राजनीति के बारे में भी यहीं से खुलासा होता है कि उक्त 19 सितंबर 2012 को इन्होंने सिर्फ कांग्रेस शासित राज्यों में सबसिडी वाले सिलिन्डर की संख्या को 6 से बढ़ा कर 9 किया था। यहाँ ये बताना भी बहुत जरूरी है कि साल में 6 सिलेन्डर की नीति भी कांग्रेस ने ही लागू की थी। जब कांग्रेस की इस नीति का बहुत विरोध या किया गया तो फिर 17 जनवरी 2013 को पूरे देश पर एहसान करते हुये सब्सिडी वाले 9 सिलेन्डर देने का प्रावधान किया गया।(लिंक नं॰ 2) 
इस निर्णय में राहुल गाँधी को दयावान की भूमिका में प्रस्तुत किया गया था ये शायद कुछ लोगों को याद भी हो। यदि आपको ये याद न हो तो आप नीचे की तस्वीर में लिंक नं॰ 4 देख सकते हैं। 

LPG History 2

भाजपा की वर्तमान सरकार का ने 27 अगस्त 2014 को निर्णय लेते हुये साल में सब्सिडी वाले सिलिन्डर की संख्या 12 कर दी जो आज तक चल रही है। इसे आप लिंक नं॰ 3 और 4 से समझ सकते हैं। अब बात करते हैं LPG गैस की तत्कालीन और वर्तमान कीमतों की जिसे जानना आपके लिए वाकई आँख खोलने जैसा ही होगा। 2 जनवरी 2014 को बिना सब्सिडी वाले LPG गैस सिलेन्डर की कीमत थी 1241 रुपये यह जानने के लिए यहाँ क्लिक करें जो कि 1 जून 2018 को  698.50 रुपये मात्र रह गई है यह जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। ये दोनों कीमतें दिल्ली की हैं। **याद है 700-800 रुपये तो आपको तब खर्च करने पड़ते थे जब पूरे दिन लाईन में खड़े रहने पर भी गैस नहीं मिलती थी और मजबूरी में आपको काला-बाजारी से गैस लेनी पड़ती थी। अब बात करें सब्सिडी वाले LPG गैस की तो 2 जनवरी 2014 को लगभग 414 रुपये थी इस बात को जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। जो कि अब 1 जून 2018 को 493 रुपये है इसे जानने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं। ये दोनों कीमतें दिल्ली की हैं। जबकि विपक्ष द्वारा प्रचारित करते समय बिना सबसिडी वाले सिलिन्डर की कीमत 700 रुपये बताई जाती है। ये सही है कि चार सालों में LPG गॅस सिलेन्डर की कीमतों में 80 रुपये कि बढ़ोत्तरी हुई है, अर्थात लगभग 5% मात्र की वार्षिक वृद्धि।

अब ये तय करना आपके खुद के हाथों में है कि आप अपनी यादाश्त पर भरोसा करना चाहेंगे या फिर उनके ऊपर जो आपके कमजोर यादाश्त का फायदा  उठाने की कोशिश में लगे रहते हैं।

यूँ तो आप स्वयं भी चेक कर सकते हैं फिर भी आपकी सुविधा हेतु सारे लिंक नीचे दिये गए हैं:
*  लिंक नं॰ 1
*  लिंक नं॰ 2
*  लिंक नं॰ 3
*  लिंक नं॰ 4