आखिर क्यों जरूरी हुआ कश्मीर में सत्ता से संधि-विच्छेद

जम्मू कश्मीर में सरकार से भाजपा के समर्थन वापस लेते ही केंद्रीय सुरक्षा बल पूरी तरह से सक्रिय हो गया और ऑपरेशन ऑल आउट के तहत 180 आतंकियों की हिट-लिस्ट तैयार कर उस पर एक्शन शुरू कर दिया. तो क्या यही वज़ह थी भाजपा द्वारा सरकार से समर्थन वापसी की जिसे सरकार में रहते हुए अंजाम नहीं दिया जा सकता था? क्योंकि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का अलगाववादियों के प्रति नरम या फिर सहयोगी रवैया इसमें आड़े आ रहा था. या कुछ और भी था जो भाजपा को अन्दर ही अन्दर परेशान कर रही थी.

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कठुआ मामले में जम्मू के डोगरा हिन्दुओं के विरुद्ध एकतरफा कार्रवाई और उनका निरंतर अपमान और प्रताड़ना के फलस्वरूप हिन्दुओं में उपजा आक्रोश.

जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड में 400 से अधिक मुसलमानों की बहाली का मामला.

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आईएसआईएस की हिमायती "जमियत अहले हदीस" को श्रीनगर में ईदगाह बनाने हेतु तकरीबन साढ़े छः एकड़ जमीन देने का निर्णय.

200 करोड़ की लागत से इस्लामिक विश्वविद्यालय बनाने की योजना.

अलगाववादियों और विद्रोहियों के पक्ष में एकतरफा सीजफायर के लिए दवाब डालना.

अब इतने विरोधाभासों के साथ-साथ देश और हिंदु हितों की अनदेखी भाजपा कैसे बर्दाश्त कर सकती थी. सो, हो गया सत्ता से संधि-विच्छेद.

अब, जबकि भाजपा ने जम्मू और कश्मीर की सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है, भाजपा की और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वो सुनिश्चित कर सके कि समय रहते जम्मू और कश्मीर में शान्ति कायम करने और धार्मिक भेदभाव समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये जाएँ.

यूँ तो, शुरूआती दौर में ऐसा लग रहा है कि सेना को दवाबमुक्त होकर काम करने के निर्देश दिए जा चुके हैं. लेकिन अन्य सभी मामलों में भाजपा को कड़ी अग्निपरीक्षा का सामना करना होगा जो कि काफी चुनौतीपूर्ण भी है.







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